मंदिर में भाषण और संसद में पूजा

रवि अरोड़ा

अफ़सोस हो रहा है कि हर बार की तरह इस बार भी मैं कांवड़ लेने नहीं गया । चला जाता तो कम से कम दो चार दिन के लिए ही सही मगर वीआईपी होने का सुख तो पाता । मुख्यमंत्री और आला पुलिस अफ़सर हेलीकॉप्टर से फूलवर्षा करते , पुलिस के बड़े बड़े अफ़सर अपने भंडारों में मेरे लिए भोजन की थाली लगाते और हमेशा मुझे घूरने वाले सिपाही मेरे पाँव दबाते । बेशक मैं आज तक लाल बत्ती कूदने करने की हिम्मत नहीं दिखा सका मगर इन दो चार दिनो में जो मन में आता , वो करता । किसी को भी धमका देता और किसी को भी पीट देता । भड़ास निकालने को आती-जाती किसी की भी गाड़ी तोड़ देता और मन करता तो कोई भी वाहन जला देता । दो चार दिन को ही सही सरकार के दामाद होने का सुख तो पाता । मगर हाय री क़िस्मत , इस बार भी न जाने क्यूँ मैं कांवड़ लेने नहीं गया ।

पता नहीं किस गफ़लत में हम अपने संविधान में लिख बैठे कि हम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होंगे और राज का कोई धर्म नहीं होगा । हालाँकि हमारे नेताओं को पहले दिन से ही अक़्ल आ गई थी और उन्हें पता चल गया था कि संविधान जैसी चीज़ें अलमरियों के लिए ही होती हैं और उनसे वोट नहीं पाया जा सकता । तभी तो मंदिरों की ड्योढ़ियों पर माथा टेकने और मज़ारों पर चादर चढ़ाने में कोई भी किसी से पीछे नहीं रहा । हज यात्रा पर सब्सिडी , मदरसों पर दौलत लुटाना और हज हाउस बनवाने जैसे काम उन्होंने किए तो अब कैलाश भवन बनवाने, मंदिरों को मॉल बनाने और कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा ये लोग कर रहे हैं । तू डाल डाल मैं पात पात का पैग़ाम देने को हमारे मोदी जी ने प्रदेश का मुखिया ही एक गेरुआ वस्त्र धारी को बना दिया । अब ये गेरुआ वस्त्र धारी योगी जी महाराज पुराने धुरंधर हैं सो इशारा क्यों नहीं समझेंगे ? तभी तो एसा कोई मौक़ा नहीं चूकते जिससे अपने लोगों को संदेश दे सकें कि अब उधर वालों की नहीं इधर वालों की सरकार है ।

यह बात तो अपनी समझ में ख़ूब आती है कि हम भारतीय उत्सवधर्मी हैं और हमारी संस्कृति मेले-ठेले की है । हर चौथे दिन हमारा कोई त्योहार है और यदि हम कांवड़ नहीं भी लाएँगे तो कुछ और लाएँगे । पुलिस का काम है हमारी सुख-सुविधा का ख़याल रखना और हमारे जुलूसों , यात्राओं और मेलों में सुरक्षा इंतज़ाम करना । मगर अब जो नई परम्परायें डाली जा रही हैं उसकी रौशनी में तो मैं बस कल्पना कर रहा हूँ कि यदि कल को उनकी सरकार आई तो हम अपनी पुलिस को और किस किस काम में लगाएँगे ? हो सकता है मोहर्रम के जुलूस के बाद अपनी पीठ छील लेने वाले अकीदतमंदों की मरहम पट्टी पुलिस को करनी पड़े । ईद पर सेवइयाँ घर घर पहुँचाने अथवा क़ुरबानी के काम में पुलिस को लगाया जाए । तीसरे वालों की सरकार आ गई तो क्रिसमस पर घर घर मोमबत्तियाँ और केक पहुँचाने का काम पुलिस के ज़िम्मे होगा और हो सकता है कि चर्च में प्रार्थना गीत भी पुलिस के बड़े अफ़सर गायें । सरकार चौथे वालों की आ गई तो गुरुपर्व पर संगत को लंगर वरताते पुलिस वाले हमें दिखाई पड़ें अथवा जुलूस के आगे सड़क पर पानी का छिड़काव पुलिस ख़ुद करे । कल्पना की उड़ान रुक ही नहीं रही और आने वाले दिनो में पुलिस की भूमिका को लेकर मन नई नई कहानियाँ गढ़ रहा है । अब आप इस बात पर ज़्यादा दिमाग़ न लगाइए कि बड़े अफ़सरों के घर राशन और गैस के सिलेंडर पहुँचाने और उनके बच्चों को स्कूल से लाने और छोड़ने के साथ साथ पुलिसकर्मी यह नई भूमिका में कैसे फ़िट होंगे । अज़ी ऊपरी आदेश होगा तो सब कुछ होगा ।

हाल ही में एक फ़िल्म देखी-मुल्क । उसमें एक डायलॉग है कि मुल्क बचाना है तो मंदिर में भाषण और संसद में पूजा से बचना होगा । बकवास सरासर बकवास । अब पहले मुल्क बचायें या सरकार ? अज़ी सरकारें तो मंदिर में भाषण और संसद में पूजा से ही अब चलती हैं ।

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