भईया एक हाफ़

रवि अरोड़ा
मैंने भी अब समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का निर्णय ले लिया है । तय कर लिया है कि अब मैं भी शराब से सुलह कर लूँगा और संडे हो या मंडे रोज़ खाओ अंडे की तर्ज़ पर प्रतिदिन दारू पीयूँगा । क्या करूँ अब देश-प्रदेश चलाना है तो अपनी तरफ़ से कुछ तो योगदान देना ही पड़ेगा । वैसे भी जब सरकार की यही तवक्को है कि कुछ और करो या न करो मगर शराब ज़रूर पियो तो यही सही । अब आप पूछ सकते है कि इस बुढ़ापे में आकर मुझे यह इल्हाम कैसे हुआ ? कैसे उम्र के इस मोड़ पर आकर शराब की उपयोगिता से मैं वाक़िफ़ हुआ ? तो जनाब मैं अपनी ग़लती मानता हूँ और स्वीकार करता हूँ की यह फ़ैसला मुझे बरसो पहले कर लेना चाहिये था । दरअसल इसमें मेरी ग़लती भी उतनी अधिक नहीं है । अब से पहले मुझे किसी ने अहसास ही नहीं कराया कि देश के उत्थान में शराब की इतनी बड़ी भूमिका है । किसी ने बताया ही नहीं कि शराबी कह कर समाज के जिस वर्ग को उपेक्षित किया जा रहा है दरअसल यही वर्ग है जो तमाम सरकारें चला रहा है । ये तमाम सड़कें, पुल, स्कूल और अस्पताल उसी के पैसे से सरकारें बनाती हैं । धन्यवाद योगी जी आपने मेरी आँखें खोल दीं ।
इतवार को कुछ ज़रूरी सामान ख़रीदने की ग़रज़ से बाज़ार जाना हुआ मगर तमाम दुकानें बंद मिलीं । हालाँकि मैं अच्छी तरह जानता था कि शुक्रवार रात से सोमवार सुबह तक का लॉक़डाउन है मगर मेरी जानकारी में था कि परचून और दवा की दुकानें खोल सकते हैं । गोया कि सामान ख़रीदने कई जगह गया मगर कहीं कोई दुकान खुली नहीं मिली । यहाँ तक कि तक दवा की दुकानें भी बंद थी । बस एक तरह की दुकानें खुली थीं जिन पर लिखा था- अंग्रेज़ी अथवा देसी शराब की सरकारी दुकान या ठंडी बीयर । इन दुकानों पर भीड़ भी ख़ूब दिखी । दुकानदार और ग्राहकों की सुरक्षा के लिए पुलिस की एक जिप्सी भी वहाँ मौजूद थी। हताश-निराश होकर मोहल्ले के कई परचून दुकानदारों को फ़ोन मिला दिया और सूरते हाल जानने का प्रयास किया । पता चला कि लॉक़डाउन की वजह से सामान्य ग्राहक घर से ही नहीं निकल पा रहे तो दुकानें किसके लिये खोलें ? यूँ भी ग्राहक से अधिक पुलिस वाले शनिवार-रविवार में आ जाते हैं और उन्हें मुफ़्त में सामान देना पड़ता है । एक चौराहे पर रुक कर पुलिस का तमाशा मैंने भी देखा । एक व्यक्ति पुलिस से यूँ उलझ रहा था कि उसने दवा लाने की बात कही थी मगर उसके पास डाक्टर का पर्चा नहीं था । इसी बीच कई एसे लोग वहाँ से धड़ल्ले से निकल गए जिन्होंने कहा कि वे वाईन शॉप जा रहे हैं । बस वही वह पल था जब मुझे शराब का महत्व समझ आया और अपनी हीनता और दारू के महात्म का अहसास हुआ ।
तमाम ख़बरें बताती हैं कि अधिकांश राज्यों की सबसे अधिक आमदनी पेट्रोल-डीज़ल और शराब की बिक्री से ही होती है । यूपी में भी बीस फ़ीसदी सरकारी आमदनी अकेले शराब से ही है । पिछले साल ही सरकार ने 24 हज़ार करोड़ रूपया शराब की बिक्री से कमाया । प्रदेश में 18 हज़ार शराब की दुकानें हैं और उन्हें एक दिन के लिए भी बंद करने का साहस सरकार नहीं रखती । शराब से हो रही आमदनी को देखते हुए प्रदेश सरकार ने अब मॉल में भी शराब की बिक्री की अनुमति दे दी है । वैसे एक सवाल दिमाग़ में आता है कि जीएसटी के रूप में टैक्स तो सभी तरह के सामान पर सरकार को मिलता होगा ? फिर अकेले शराब पर ही इतनी मेहरबानी क्यों ? और वह भी एसी पार्टी के शासन में जो नैतिकता के पाठ सुबह शाम हमें पढ़ाती है ? उस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जो गेरुए वस्त्र पहनते हैं ? कहीं एसा तो नहीं कि यह सरकार शराब सिंडिकेट के हाथों में खेल रही है और येन केन प्राकेण हमें भी नशे के गर्त में धकेलने पर तुली है ? क्या इस सरकार के कर्णधार दिमाग़ी रूप से दिवालिया हैं या किसी साज़िश के तहत एसा कर रहे हैं ? देखिये हो गई न गड़बड़ ? शराब पीए बिना लिखने बैठ गया और आएँ बाएँ सवाल करने लगा । सोरी भाईयों मेरी बात ख़त्म, मैं तो अब बोतल ख़रीदने जा रहा हूँ और मेरी मानिये तो आप भी जाइये और दुकान की जाली में हाथ डाल ज़ोर से कहिये- भईया एक हाफ़ ।

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