बुरी मुद्रा बनाम बुरे मुद्दे 

रवि अरोड़ा
स्कूल कालेज के दिनों में यह सिद्धांत इतनी बार पढ़ाया गया कि शायद मरते दम भी इसे भुलाना संभव न होगा । आप में से अनेक लोगों ने भी अर्थशास्त्र पढ़ते हुए ग्रेशम का यह मौद्रिक सिद्धांत अच्छी तरह रटा होगा कि बुरी मुद्रा अच्छी मुद्रा को प्रचलन से बाहर कर देती है। हालांकि उन दिनों पढ़ा तो राजनीति शास्त्र भी था मगर पता नहीं क्यों ऐसा कोई सिद्धांत नहीं पढ़ाया गया कि घटिया मुद्दे जरूरी मुद्दों को चर्चा से बाहर कर देते हैं ? जबकि यह राजनीतिक सिद्धांत भी उतना ही जमीनी है जितना कि ग्रेशम का मौद्रिक सिद्धांत। दूर क्यों जाएं पिछ्ले चंद रोज पर ही निगाह दौड़ा लें। एक से एक जरूरी और महत्वपूर्ण मुद्दे हमारे इर्दगिर्द थे जो गंभीर चर्चा की मांग करते थे मगर ऐसा हुआ नहीं और हम सभी मुब्तला हो गए ” वन नेशन वन इलेक्शन “, ” भारत बनाम इंडिया ” और ” सनातन ” जैसी गैर जरूरी बातों में ? सत्ता पक्ष तो ख़ैर हमेशा ही चाहेगा कि अनावश्यक बातें चर्चा में रहें ताकि जरूरी बातों पर उसकी जवाबदेही का दबाव कम हो मगर विपक्षी पार्टियों को क्या हुआ , वे क्यों इतनी पगला गई हैं और जनता के मुद्दों को दरकिनार कर बार बार मोदी जी द्वारा तैयार पिच पर ही खेलने पहुंच जाती हैं ? पिच भी ऐसी जिसकी गोल पोस्ट मोदी जी जब चाहें इधर से उधर कर सकते हैं ?

संसद का पांच दिवसीय विशेष सत्र बुला लिया गया है। आगामी 18 से 22 सितंबर तक चलने वाले इस सत्र का एजेंडा क्या है , यह केवल सरकार को पता है मगर कयास तरह तरह के लगाए जा रहे हैं। सत्र से पहले ही अनेक गैर जरूरी बातें हवाओं में उछाली जा रही हैं। हिंदू राष्ट्र की घोषणा , एक देश एक चुनाव का एलान, देश का नाम इंडिया से पूरी तरह भारत करने और न जानें क्या क्या बातें की जा रही हैं। संविधान के जानकर बताते हैं कि इनमें से कुछ भी किया जाना संभव नहीं है। यदि राजनीतिक जिद के तहत ऐसा एक भी प्रस्ताव संसद के समक्ष लाया जाता है तो उसके परिणाम अप्रिय ही होंगे मगर फिर भी न जानें क्यों विपक्ष डरा हुआ है। उसके डर से सत्तानशीं लोगों के चेहरे खिले हुए हैं और वे ऐसे कयासों को हवा दे रहे हैं। ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग भी जानते हैं कि हिन्दू राष्ट्र की घोषणा की इजाजत उन्हें संविधान नहीं देता, एक देश एक चुनाव व्यवहारिक नहीं है और तात्कालिक लाभ के लिए ऐसा कर भी दिया जाता है तो यह व्यवस्था शीघ्र ही ध्वस्त हो जायेगी। देश का नाम पूरी तरह भारत करना भी व्यवहारिक नहीं है। अव्वल तो दक्षिणी राज्यों की इसमें सहमति नहीं होगी और जबरन ऐसा कर भी दिया गया तो करेंसी, विभागों और सार्वजानिक सम्पत्ति जैसी जगहों से इंडिया शब्द हटाना देश पर इतनी बड़ी आर्थिक चोट देगा कि अर्थव्यवस्था ही ध्वस्त हो जायेगी। मगर फिर भी जिसे देखो, वही इसके पक्ष अथवा विपक्ष में दलीलें दे रहा है।

देश हाल ही में मणिपुर और हरियाणा के नूह जैसी जातीय और धार्मिक हिंसा से गुजरा है। करोड़ों किसान एमएसपी को लेकर उद्वेलित हैं। महंगाई, बेरोजगारी, बाढ़, सूखा और राज्यों से टकराव जैसी अनेक समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। देश के लोगों को अभी तक अडानी, चीन से सीमा विवाद और देश का पैसा हड़प कर विदेशों में ऐश कर रहे दर्जनों रईसों संबंधी सवालों के जवाब नहीं मिले । मगर चर्चाएं हैं कि अनावश्यक मुद्दों से घिरी हुई हैं। मीडिया, सोशल मीडिया, राजनीति और तमाम जगह बात ग्रेशम के बुरी मुद्रा वाले सिद्धांत जैसी ही हो रही है । अब आप ही बताइए । अर्थशास्त्र की तरह राजनीति शास्त्र के लिए भी कुछ ऐसे सिद्धांत तैयार करने का समय नहीं आ गया है क्या ?

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