बात सनातन धर्म की

रवि अरोड़ा
एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में बैठा था । धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के चलते सभी मंचासीन मेहमान जूते नीचे उतार पर मंच पर विराजमान थे । तभी एक अन्य अतिथि पधारे और जूते समेत मंच पर आ धमके । इस पर लोगों ने उन्हें जूते नीचे उतारने का अनुरोध किया । अतिथि ने तुरंत अपनी गलती सुधारी और जूते के फीते खोलने लगे। जूते तो ख़ैर उन्होंने नीचे जाकर उतार दिए मगर उन्हें लगा कि हाथ तो जूतों को छूने के कारण दूषित हो गए । इस पर अतिथि की आंखें हाथ धोने के किए पानी ढूंढने लगीं मगर इत्तेफाक से पानी कहीं आसपास नहीं था । तभी मंच पर विराजवान एक विद्वान पंडित जी जोर से बोले कि भाई साहब आप ऐसे ही आ जाइए । मैं अभी मंत्र पढ़ कर आपको पवित्र किए देता हूं और उन्होंने तुरंत ही सस्वर श्लोक का उच्चारण कर दिया- ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याभंतर: शुचि: । जाहिर है मंत्र के बाद अतिथि और अन्य सभी लोगों की उलझन खत्म हो गई और सभी लोग पवित्रता के भाव से ओतप्रोत हो गए । मैं यह सब तमाशा बड़े गौर से देख रहा था और मन ही मन विचार कर रहा था कि कैसे तो जूते के फीते खोलने से अतिथि महोदय अपवित्र हो गए और कैसे एक मंत्र के उच्चारण भर से उनकी पवित्रता लौट आई ?


चार किताबें पढ़ने के कारण मुझे मालूम है कि हिन्दू धर्म में पुण्डरीकाक्ष शब्द भगवान विष्णु के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कहा भी जाता है कि भगवान विष्णु ही जल के देवता हैं तथा यदि कोई उनका जाप करते हुए स्नान करता है तो विष्णु उसे सभी संसारिक पापों से मुक्त कर देते हैं। बोले गए श्लोक का अर्थ भी कुछ इसी प्रकार का है कि कोई भी मनुष्य जो पवित्र हो, अपवित्र हो या किसी भी स्थिति को प्राप्त क्यों न हो, जो भगवान पुण्डरीकाक्ष का स्मरण करता है, वह बाहर-भीतर से पवित्र हो जाता है। भगवान पुण्डरीकाक्ष पवित्र करें।

मेरे घर में दर्जनों बार हवन का आयोजन हुआ है। हर बार पंडित जी लकड़ी के तख्ते पर बनी पंचांग पीठ लेकर आते हैं और उसी पर नवग्रह की पूजा संपन्न कराते हैं। ओंकार, गौरी गणेश के साथ नवग्रह ने रूप में सूर्य, चन्द्रमा और राहु केतु आदि की पूजा होती है । सभी देवताओं का आतिथ्य उस लकड़ी के तख्ते पर स्नान, वस्त्र, जनेयु, इत्र, तिलक, माला, धूप, नैवेद्य, फल, पान और दक्षिणा आदि से संपन्न होती है। पचास तरह का सामान एकत्र करना खर्चीला तो होता ही है घंटों की मेहनत के चलते कष्टकारी भी होता है। सच कहूं तो अटपटी लगती है प्रतीकात्मक तरीके से होती आडंबर युक्त यह पूजा । भला दो छींटे पानी से देवता का स्नान कैसे हो सकता है और कलावा का एक छोटा सा टुकड़ा देवता का वस्त्र कैसे बन सकता है ? चलिए हम तो मन को इससे बहला लेंगे मगर क्या देवता भी इससे बहल जायेंगे ? मगर क्या किया जाए ? परंपरा है और परिवार के बुजुर्गों के आदेश पर सभी की तरह मैं भी इसका निर्वाह करता आ रहा हूं। मगर उस सांस्कृतिक कार्यक्रम में अतिथि को जब मंत्र से पवित्र किया गया तो मन बगावत कर बैठा । बात छोटी सी थी मगर ट्रिगर कर गई । सनातन धर्म की मान्यताओं के नाम पर कुछ ज्यादा ही पाखंड नहीं कर रहे है हम ? हद है, हमारे पास हर चीज का तोड़ है और हर काम के लिए कोई मंत्र ? पहले ‘विघ्न’ और फिर उसके ‘उपाय’ का ऐसा जुगाड़ तो शायद ही किसी अन्य धर्म में होगा । सितारों, ग्रहों और रूष्ट देवताओं को मनाने के शॉर्ट कट तो न जाने कैसे कैसे हैं हमारे पास । बहरहाल कुल जमा बात यह है कि यदि सचमुच यह सब पाखंड ही है तो धर्म के विद्वानों को इससे विकल्प तलाशने चाहिए और यदि हमें ये सभी कर्म काण्ड सर्वथा उचित ही जान पड़ते हैं तो फिर उन सभी हमलों को लेकर आग बबूला नहीं होना चाहिए जो सनातन धर्म पर आजकल देश के विभिन्न कोनों में हो रहे हैं

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