बात बुरांश की

रवि अरोड़ा
पिछले दो दिन से फिर पहाड़ों पर हूं । इस बार ऋषिकेश, चंबा, कान्हा ताल, धनौल्टी और मसूरी जाना हुआ। पहाड़ पर इस बार कुछ ऐसा देखा जो संभवत पहले नहीं देखा था अथवा देखा भी होगा तो इसका संज्ञान नहीं लिया। दरअसल पांच हजार फुट से अधिक की ऊंचाई वाली तमाम जगह चटक लाल रंग वाले बुरांश के फूलों से लदे पेड़ नज़र आईं । शायद ही कोई ऐसा स्थान रहा हो जहां बुरांश के दीदार न हुए हों । टूट कर गिरी फूलों की पत्तियां सड़कों को लाल रंग देने पर ही जैसी आमादा थीं मगर फूल थे कि फिर भी कम होने का नाम ही नहीं ले रहे थे । ये फूल पहले कभी क्यों नहीं दिखे ? यह समझने बैठा तो पता चला कि ये फूल फागुन की समाप्ति पर ही पेड़ों पर आते हैं और चैत माह में अपने चरम पर होते हैं । बैसाख आते आते ये आखों से ओझल हो जाते हैं । यानि कुल मिला कर मार्च और अप्रैल ही इनका सीजन है और आमतौर पर बच्चों की परीक्षाओं के चलते इन महीनों में प्लेन एरिया के हम जैसे लोग पहाड़ों पर नही जाते और यही कारण है कि कुदरत के इस नजारे से महरूम ही रह जाते हैं ।

बुरांश पर निगाह जाने की एक प्रमुख वजह यह भी रही कि कोरोना संकट के दौरान ऐसी खबरें आईं थीं कि बुरांश के फूल से कोरोना का इलाज हो सकता है । खुद इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मंडी और इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी ने भी इसकी तस्दीक की थी । वैसे यह तो हम लोग पहले से ही जानते थे कि इस फूल में एंटी ऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होता है और पहाड़ पर रहने वाले लोग इससे सर दर्द , बदन दर्द , ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और मधुमेह जैसे तमाम रोगों का इलाज कर लेते हैं । एक पेड़ के नीचे गिरे फूलों को एकत्र करती वृद्धा से जब पूछा कि वह इनका क्या करेगी तो उसने बताया कि इसकी चटनी बहुत स्वादिष्ट बनती है । वैसे इन फूलों का जूस निकाल कर पेय पदार्थ भी लोग बना लेते हैं । इस पेय पदार्थ का स्वाद जब सैलानियों को भी लग गया तो लोकल बाशिंदों ने इन्हे बोतलों में भर कर बेचना भी शुरू कर दिया और अब पहाड़ की तमाम छोटी बड़ी दुकानों पर यह जूस मिलता है । खास बात यह है कि बुरांश हिमालय का ही फूल है और आमतौर पर अन्य जगहों पर नहीं मिलता ।

हालांकि ग्लोबल वार्मिंग से अब बुरांश के समक्ष भी खतरा उत्पन्न हो गया है और बेवक्त की गर्मी सर्दी से फूल भी असमंजस में हैं कि कब खिलना है और कब नहीं । इस बार भी वह फागुन में वृक्षों पर आ जमा जबकि उसे चैत का इंतजार करना चाहिए था । हो सकता है कि अपनी विदाई के लिए वह बैसाख का इंतजार भी न करे । चलिए ग्लोबल वार्मिंग तो बड़ा मसला है और हम लोग इसमें बहुत कुछ कर भी नहीं सकते मगर जब तक भी बुरांश जैसी कुदरती नेमतें हमारे पास हैं , हम उनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते ? जब रिसर्चों से पता चल गया है कि इस फूल में बेपनाह औषधीय गुण हैं तो हम उनका उपयोग क्यों नहीं करते ? बुरांश के फूलों से जब लाखों करोड़ों हिमालय वासी अपनी तमाम बीमारियां ठीक कर सकते हैं तो क्यों सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती ? चलिए यह भी माना कि मुल्क का दवा उद्योग निजी हाथों में है और सरकार की इस और रुचि क्यों कर होगी मगर बेरोजगारी से त्रस्त उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नॉर्थ ईस्ट की बड़ी आबादी को इसके जूस, जैम और चटनी बना कर बेचने के लिए प्रोत्साहित तो किया ही जा सकता है ? सरकार ने कुटीर उद्योगों और माइक्रो स्केल इंडस्ट्रीज के लिए इतने विभाग क्यों खोल रखे हैं ? क्यों नहीं सरकार निर्यातकों को भी इस दिशा में लगाती ? सच बताऊं तो सड़कों पर बिखरे हजारों बुरांश के फूल देख कर ऐसा लगा कि जैसे कुदरत की कोई अमूल्य दौलत बिखरी पड़ी है और ऐसा कोई दीदावर इर्द गिर्द नहीं है जो उसके नूर की कद्र कर सके ।

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