बड़े बेआबरू होकर

रवि अरोड़ा

लगभग दस बारह साल पुरानी बात है । उन दिनो पीएम इन वेटिंग के नाम से पुकारे जाने वाले भाजपा के वरिष्ठतम नेता लाल कृष्ण आडवाणी एक कार्यक्रम के सिलसिले में ग़ाज़ियाबाद आने वाले थे । उन्हें लेने पार्टी के कई स्थानीय नेता गाड़ी लेकर दिल्ली गए । रास्ते में किसी विषय पर बातचीत करते हुए आडवाणी जी ने पूछा कि ये बताइये आदमी बूढ़ा कब होता है ? सबके ख़ामोश हो जाने पर आडवाणी जी ने अपने प्रश्न का स्वयं ही उत्तर दिया और कहा कि आदमी उस स्थिति में ही बूढ़ा होता है जब वह सपने देखना बंद कर देता है । अब जब अघोषित रूप से भाजपा में आडवाणी युग की समाप्ति हो रही है और उन्हें ज़बरन रिटायर किया जा रहा है , उस समय मेरे जैसे सामान्य व्यक्ति के दिलो-दिमाग़ पर यह सवाल तारी होना लाज़मी है कि क्या क्या आडवाणी जी अब भी कोई सपना देख रहे होंगे ? क्या अब भी कोई एसा सपना बचा होगा जिसे कोई व्यक्ति देखना चाहे ?

आडवाणी जी की राजनीति मुझे कभी नहीं भायी । नब्बे के शुरुआती दौर में जब देश आर्थिक उदारीकरण की राह पर चल कर विकास की कुलाँचे भर रहा था , उस समय उन्होंने देश को राम मंदिर का झुनझुना थमा दिया था। न जाने कितने दंगे हुए और न जाने कितने लोग मारे गए । दिग्भ्रमित देश का साम्प्रदायिक ताना-बाना ढीला हुआ सो अलग । यह झुनझुना आज भी कुछ लोग लिए घूम रहे हैं और पता नहीं कब मुल्क के हाथ में थमा दें । मुझे याद है कि एक प्रेस वार्ता में वे हिंदुस्तान को बार ‘हिंदुस्थान’ ‘हिंदुस्थान’ कह रहे थे । इस पर मैंने सवाल किया कि यह आपका उच्चारण दोष है या जानबूझकर कर आप एसा कर रहे हैं ? इस पर उन्होंने अपना अधकचरा भगवा ज्ञान मुझे पिलाया जिस पर मैं ही नहीं सभागार में बैठा अन्य कोई भी पत्रकार सहमत नहीं हुआ । मगर असहमतियों की उन्होंने कभी परवाह ही कहाँ की । जब जो चाहा वो कहा और जो चाहा वह किया । जनसंघ और भाजपा के संस्थापकों में से एक और भगवा दल के असली चेहरा रहे आडवाणी जी बेशक सिर से पाँव तक महत्वकांशाओं से लदे-फ़दे रहे हों मगर इतिहास गवाह है कि इसके लिए उन्होंने उतावली कभी नहीं मचाई । वर्ष 1996 में उनके प्रधानमंत्री बनने में कोई बाधा नहीं थी मगर उस समय उन्होंने बड़प्पन दिखाते हुए अपने वरिष्ठ नेता अटल बिहारी बाजपेई को आगे कर दिया । हो सकता है उन्हें अपने इस फ़ैसले पर जीवन भर पछतावा रहा हो मगर एसे तो बहुत से काम उन्होंने किए हैं जिन पर यक़ीनन वह पछताते होंगे । जिन्ना सम्बंधी बयान और गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी की कुर्सी बचाने जैसे कई दाँव उनके उलटे पड़े हैं । यही तो वे क़दम थे जिन्होंने उन्हें अर्श से फ़र्श पर पहुँचा दिया । वह पार्टी जिसे उन्होंने ही खड़ा किया वह उन्हें सम्मान जनक विदाई देने को भी तैयार नहीं । माना आज पार्टी का मतलब मोदी और अमित शाह ही हैं मगर पार्टी के हज़ारों-लाखों कार्यकर्ताओं को क्या हुआ जिन्हें उन्होंने ही बनाया ? वे क्यों ख़ामोश हैं ? हो सकता है कि आज अटल जी स्वस्थ और जीवित होते तो अपनी पार्टी में उनका भी यही हाल होता मगर वे तो अंतत लोटों में गली गली पहुँच कर सम्मानजनक विदाई पा गए मगर आडवाणी जी के भाग्य में क्या बदा है ?

बेशक आडवाणी जी की कोई कितनी भी आलोचना करे मगर यह भी ज़मीनी हक़ीक़त है कि वे स्वतंत्र भारत में लोहिया के बाद दूसरे बड़े नेता हैं जिन्होंने कोढ़ बन चुकी जाति की राजनीति को कभी बढ़ावा नहीं दिया । यही नहीं उनकी विनम्रता विरोधियों को भी अपना क़ायल बना देती है । यह विनम्रतापूर्वक कभी भी ओढ़ी हुई नहीं लगी । किसी भी सार्वजनिक स्थल पर अभिवादन स्वरूप उनके हाथ जब जुड़ते हैं तो अलग होने का नाम ही नहीं लेते । हालाँकि बँधे हाथों से मोदी जी के साथ उनकी अनेक तस्वीरों ने उनकी जगहँसाई भी कराई और कहा गया कि वे मोदी के समक्ष याचक सा बन कर खड़े हो जाते हैं और मोदी जी उनके अभिवादन का भी जवाब भी नहीं देते । वैसे ये मोदी जी वही हैं जिन्हें आडवाणी जी ने ही न केवल गढ़ा और तराशा बल्कि तमाम मुसीबतों से भी हर बार बचाया । कहते हैं कि न्याय दो प्रकार का होता है । पहला सामाजिक और दूसरा प्राकृतिक़ । अब जब आडवाणी जी के लिए एक एक कर तमाम रास्ते बंद किए जा रहे हैं , मैं समझ नहीं पा रहा कि यह उनके साथ हो रहा सामाजिक इंसाफ़ है या प्रकृति का कोई न्याय । अपने गुरु और जनसंघ के संस्थापक प्रोफ़ेसर बलराज मधोक के साथ कभी उन्होंने भी तो एसा किया था । इस न्याय अथवा अन्याय के बाबत आपकी समझ में कुछ आए तो मुझे अवश्य बताइएगा ।

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