फोटो खिंचवाने के बाद

फोटो खिंचवाने के बाद
रवि अरोड़ा
प्रदेश की योगी सरकार दावा कर रही है कि विगत 9 जुलाई को उसने प्रदेश भर में 37 करोड़ पौधे लगाए । यदि वाकई ऐसा हुआ है तो यह बहुत बड़ी बात है। एक ऐसे प्रदेश में जहां वन आच्छादित क्षेत्रफल काफी कम है, वहां ऐसे प्रयास सचमुच सराहनीय हैं। योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में ही साल 2017 से अब तक 204 करोड़ पेड़ लगाने का दावा किया गया है। पूर्व की सरकारों द्वारा भी यकीनन ऐसे ही प्रयास किए गए होंगे मगर फ़िलवक्त उनके आंकड़े हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं। हां साल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा एक ही दिन में पांच करोड़ वृक्ष लगाने की खबर जरूर निगाह से गुजरी। इस हिसाब से देखें तो आजादी के बाद से प्रदेश में न जाने कितने सौ करोड़ वृक्ष तत्कालीन सरकारों द्वारा लगाए गए होंगे । प्रदेश की आबादी 23 करोड़ हैं और इस हिसाब से तो यह तादाद अच्छी खासी है मगर क्या हमें वाकई अपने इर्द गिर्द इतने वृक्ष नज़र आते हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि सरकारों ने तो इतनी बड़ी संख्या में वृक्ष लगाए हों मगर वे पनप न सके हों और वक्त के साथ मर गए हों मगर योगी सरकार तो दावा कर रही है कि उनके द्वारा लगाए गए 75 फीसदी पेड़ जिंदा हैं और फल फूल रहे हैं। इस हिसाब से तो प्रदेश में चहुं ओर जंगल ही जंगल होने चाहिए ? मगर भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के अनुसार तो प्रदेश का कुल वन आवरण मात्र 14,805.65 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का केवल 6.15% है ?
आंकड़े दावा करते हैं कि आजादी के समय देश में 14 फीसदी भूभाग पर वन थे मगर विकास की अंधी दौड़ में हमने उन्हें भारी संख्या में काट डाला । साल 1988 में हमने राष्ट्रीय वन नीति का ऐलान किया और अपना वन आच्छादित क्षेत्रफल 33 फीसदी बढ़ाने की घोषणा की मगर हुआ क्या ? अगले 22 सालों में साल 2010 तक हम मात्र 0.7 फीसदी ही वृद्धि कर सके । मगर न जाने क्यों अब अचानक बड़े बड़े दावे किए जाने लगे हैं। कहा जा रहा है कि देश में कुल भूभाग के 25.17% हिस्से पर अब वन हो गए हैं । अब सरकारी दावों को जांचने का कोई पैमाना तो साधारण नागरिकों के पास हो नहीं सकता । उसके पास तो केवल दो ही विकल्प हैं। या तो वह इन आंकड़ों पर यकीन करे अथवा आधुनिक सेटेलाइट्स से सुसज्जित अंतराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा जारी आंकड़ों को भी जांचे। जानी मानी एजेंसी ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के अनुसार तो 2000 से 2023 तक भारत में वृक्ष बड़े नहीं वरन् घटे हैं और इस दौरान 23,300 वर्ग किलोमीटर वृक्ष क्षेत्र की हानि हुई, जो कुल वृक्ष क्षेत्र का 6% है। यह कमी मुख्य रूप से वन विखंडन, शहरीकरण, कृषि विस्तार और जंगलों में लगी आग के कारण हुई। पूछा जा सकता है भारत सरकार और ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के आंकड़ों में इतना अंतर क्यों है ? उसका सीधा सा जवाब यह है कि भारत सरकार अपने आंकड़े सुंदर बनाने के तमाम प्रयास करती है और यही नहीं चाय अथवा अन्य बागों को भी वन क्षेत्र में गिनती है जबकि अंतराष्ट्रीय मानकों के अनुसार उन्हें जंगल नहीं कहा जा सकता । इस एजेंसी के अनुसार दुनिया के कुल वन क्षेत्र में हमारी हिस्सेदारी मात्र सवा दो परसेंट है जो मानवीय आबादी के हमारे आंकड़े 17 फीसदी के अनुपात में बेहद कम है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा के साथ साथ प्रकृति के प्रति हमारा नजरिया अब पूर्व के मुकाबले अधिक उदार हुआ है। वृक्षों की देखभाल और हर साल वर्षा ऋतु में उनके रोपड़ के कार्य में भी साल दर साल तेजी आई है। स्कूली बच्चे , सरकारी विभाग और तमाम सरकारें इस ओर जागरूक हुई हैं। देर सवेर इसके परिणाम आने भी तय हैं मगर क्या ही अच्छा हो कि हम झूठी वाहवाही का लोभ भी त्यागें और सही सही और तार्किक आंकड़े जनता के समक्ष परोसें। उधर , जो संस्थाएं पौधारोपण कार्यक्रम चलाएं वे भी फोटो खिंचवाने तक ही सीमित न रहें और पौधे के बड़ा होने तक उसकी देखभाल भी करें। यह मुआ कैमरा जब से आया है, इसने ड्रामेबाजी की हमारी प्रवृति में भी तो चार चांद लगा दिए हैं।

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