फिर भी एक अवसर है

रवि अरोड़ा
कोरोना पर विधवा विलाप सुनते दिल ही न बैठ जाये इसलिए क्यों न कुछ अच्छी अच्छी बातें भी कर ली जायें । यूँ भी बुज़ुर्ग कहते तो हैं ही कि हर बुराई का कोई न कोई उजला पक्ष भी होता ही है । एसी कोई बाढ़ नहीं जिसने धरती की मृदा शक्ति न बढ़ाई हो अथवा सूख चुके जलायशों को फिर पानी से लबालब न किया हो । अब इस कोरोना से भी तो कुछ न कुछ हम भारतीयों की झोली में भी आएगा । राजनैतिक-सामाजिक परिवर्तन पर फिर कभी , आज तो आर्थिक पहलुओं पर ही चर्चा कर लेते हैं । बेशक क़ोविड-19 ने देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है और हमारी जीडीपी माइनस में पहुँचने का ख़तरा है। असंघटित क्षेत्र में रोज़गार का व्यापक संकट सिर पर है और भयंकर मंदी मुँह बाये खड़ी है मगर फिर भी कुछ तो एसा अब भी है जो हमारे लिए अवसरों की सौग़ात ला सकता है ।
पीछे मुड़ कर देखें तो वित्त वर्ष 2019-20 हमारे लिए अच्छी ख़बरें नहीं लाया और जाते जाते कोरोना का संकट और आन पड़ा । हालाँकि पिछले दो सालों से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था नीचे जा रही है और नब्बे फ़ीसदी अर्थव्यवस्थाएँ ढलान पर हैं तथा पिछले दस सालों में सबसे कमज़ोर हैं मगर भारत की अर्थव्यवस्था तो निजी कारणों से ही नीचे आती मानी गई । नोटबंदी और जीएसटी की व्यवस्था से देश की जीडीपी आधी ही रह गई । रोज़गार के अवसर कम हुए और महँगाई में भी तेज़ी से वृद्धि हुई । और अब कोरोना के कारण पिछले चालीस सालों में पहली बार जीडीपी नकारात्मक होने के कगार पर पहुँच गई है । लोगों की आमदनी आधी रह जाने के कारण घरेलू माँग पर भी निश्चित तौर पर उसका असर पड़ना है । कोढ़ में खाज का काम करेंगे 45 फ़ीसदी असंघटित क्षेत्र के श्रमिक जिनके रोज़गार अब ख़तरे में हैं । शुक्र है कि देश की अर्थव्यवस्था में लगभग बीस फ़ीसदी का कृषि क्षेत्र अभी भी मज़बूती से खड़ा है वरना मैनुफ़ैक्चरिंग क्षेत्र के 26 फ़ीसदी और सेवा क्षेत्र के 53 फ़ीसदी कारोबार के ही भरोसे होते तो कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तरह हमारी भी लुटिया डूब जाती ।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बदले हालात में चीन से हमारा कारोबार अब पहले जैसा नहीं रहेगा । इस कारोबार से सदा चीन को ही फ़ायदा हुआ है । पिछले वित्त वर्ष में ही हमने लगभग 70 अरब डालर का आयात और केवल 17 अरब डालर का निर्यात चीन को किया । देश में 45 फ़ीसदी इलैक्ट्रोनिक , 90 परसेंट मोबाईल फ़ोन, एक तिहाई मशीनरी ,40 फ़ीसदी कैमिकल और 65 परसेंट दवाइयाँ चीन से आ रही हैं । भारत सरकार ने चीन से आयात पर अनेक क़िस्म की रोक फ़िलहाल लगा दी हैं । यदि यह जारी रहती हैं तो निश्चित तौर पर देश के मैन्युफ़ैक्चरिंग सेक्टर को इसका भरपूर लाभ मिलेगा । चीन की ऑनलाइन कम्पनियों पर भी मोदी सरकार की तिरछी नज़र है ।
पिछले कुछ सालों में चीन दुनिया का सबसे बड़ा मैन्युफ़ैक्चरिंग हब बन कर उभरा था और इसी के बल पर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था में 19 फ़ीसदी उसकी हिस्सेदारी हो गई थी । बदले हालात में तमाम देश चीन से अपना कारोबार समेट रहे हैं और उनकी निगाह अब भारत और ब्राज़ील जैसे देशों पर है । भारत का अपना बड़ा बाज़ार उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर सकता है बस एसे में थोड़ी होशियारी और समझदारी की ज़रूरत है । भारत का कमज़ोर इंफ़्रास्ट्रक्चर और कम्पनियों की गुप्तता सम्बंधी हमारी कमज़ोर शैली आढ़े आ रही हैं । वोडाफ़ोन कांड और मेक इन इंडिया की घोषणाओं के सिरे न चढ़ाने से भी हमारी पहले ही काफ़ी बदनामी हो चुकी है । उधर, यह तय है कोरोना के ख़त्म होने के बाद पूरी दुनिया में राष्ट्रवाद का ज्वार आएगा । ज़ाहिर है कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा । अब राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि उसे अपने लिए कोई दुश्मन भी चाहिये । इस मामले में हमारे राजनीतिज्ञ पूरे सिद्धस्त हैं। यदि इस अवसर पर भी उन्होंने वही पुरानी हिंदू-मुस्लिम की राजनीति की तो यक़ीन जानिए यह मौक़ा तो हाथ से जाएगा ही साथ ही हम फिर से वहीं पहुँच जाएँगे , जहाँ से शुरू हुए थे ।

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