फ़र्श से अर्श तक

( कुछ साथियों के आदेश पर पूरा लेख हूबहू यहाँ पेश कर रहा हूँ । जिन मित्रों की रुचि ग़ाज़ियाबाद और उसकी पत्रकारिता में नहीं है उन्हें अपना समय जाया करने की सलाह मैं नहीं दूँगा । अलबत्ता शहर के पत्रकार साथियों और उनके चाहने वालों के लिए इसे पढ़ना शायद सुखद हो )

ग़ाज़ियाबाद की पत्रकारिता

फ़र्श से अर्श तक

रवि अरोड़ा

समझ नहीं आता कि बात कहां से शुरू करूं ?अब यदि विषय ग़ाज़ियाबाद में पत्रकारिता और उसके इतिहास से जुड़ा हो तो यकीनन किसी की भी पेशानी पर बल पड़ना लाजमी है । बीते दिनों को याद करने बैठा हूं तो तसव्वुरात की परछाइयां उभरती हैं और उभरती ही चली जाती हैं । यादों के साये में कुछ अक़्स साफ दिखाई देते हैं तो कुछ बेहद धुँधले । कुछ लोगों के नाम चाह कर भी याद नहीं आते और कई ऐसे हैं जो स्मृतियों पर बकायदा कब्जा ही जमाए बैठे हैं । चूँकि इसी शहर में आंखें खुली थीं अतः बीते हुए कल के कई प्रभावी पत्रकारों को नजदीक से देखने और जानने का मौका मिला। उम्र उस समय अधिक नहीं थी अतः झिझक और अल्पज्ञान के चलते इतिहास के इन पुरोधाओ से गुफ्तगू नहीं कर पाया । जब तक उनसे कुछ सीखने और समझने की उम्र आई उनमें से अधिकांश इस दुनिया से विदा हो चुके थे । इतिहास के यह किरदार कुछ बड़े थे तो कुछ बहुत बड़े । कुछ घटनाएं महत्वपूर्ण थीं तो कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण । अखबार और अखबार नवीस दोनों थे और दोनों ही चौकस थे । शहर के अखबार विधायिका और कार्यपालिका के मार्ग दर्शक की भूमिका में थे तो न्यायपालिका का भी यह नज़रिया रहता था कि शहर की नब्ज जाननी है तो स्थानीय अखबारों को पढ़ो । उस दौर में भी टीवी नहीं था मगर अखबार भी न्यूज़ चेनलों से कमतर नहीं थे । तो चलिए घूम आयें गाजियाबाद की पत्रकारिता के इतिहास में ।

बहुत पीछे की तो मैं नहीं जानता मगर बात पिछली सदी के छठे दशक से तो शुरु कर ही सकता हूं । यह वह दौर था जब पत्रकारिता एक मिशन थी और इससे वही लोग जुड़ते थे जो अपना घर बार फूंकने को तैयार रहते थे । अधिकांशत साहित्यकार ही पत्रकारिता की विधा में हाथ आज़माते थे। या यूं कहिए उस दौर में पत्रकारिता साहित्य की एक विधा ही थी । ( क्रमशः )

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