प्रजा का इतिहास

रवि अरोड़ा

रानी पद्मावती का बात बहुत हो चुकी अब ज़रा उन सोलह हज़ार स्त्रियों की भी चर्चा हो जाए जो रानी के पीछे पीछे अग्निकुण्ड तक चली गईं । उन लाखों सैनिकों को भी याद कर लें जो राजा रतन सेन और अलाउद्दीन ख़िलजी के बीच हुए युद्ध में मारे गए । उन तमाम छोटे बड़े युद्धों में मारे गए उन लाखों लाख गुमनाम सैनिकों का भी स्मरण करें जो हज़ारों साल तक राजाओं की मूँछों की भेंट चढ़ते रहे। ज़ाहिर है कि इन सब योद्धाओं का कहीं कोई नाम नहीं है । उनका कहीं कोई इतिहास नहीं है । उनके नाम पर कोई क़िला नहीं है , कोई महल नहीं है । क्या अब हमें जान नहीं लेना चाहिए कि रानी पद्मावती के नाम पर सड़कों पर कोहराम मचाने वाले हम लोग पद्मवतियों की नहीं उन गुमनाम स्त्रियों की संतानें हैं जिनका भाग्य अपनी रानियों से बँधा था ? क्या इसमें कोई शक है कि हमारा पूर्वज रतनसेन नहीं उसका कोई गुमनाम सैनिक रहा होगा ? अपने आस पास के जिन लोगों को हम ख़िलजी का वंशज कह कर हिक़ारत से देख रहे हैं , वे ख़िलजी के साथ तुर्किस्तान से नहीं आए थे । उनके पूर्वज भी हमारे ही लोग थे । हम कब तक राजा महाराजाओं की बात करेंगे ? हज़ारों साल से प्रजा बने हम लोग आख़िर कब अपना इतिहास जानेंगे ? ज़रा ठहर कर विचार तो करें कि इन हज़ारों वर्षों में हम आम लोग कहाँ थे ? किस हाल में थे ? क्यों हम ही कठपुतली की तरह हर बार नचाए गए ? क्यों बार बार हमें ही युद्ध के मैदान में भेजा गया ?

धर्मग्रंथ बताते हैं कि महाभारत के युद्ध में अट्ठारह अक्षोहिणी सेना यानि लगभग चालीस लाख लोगों ने हिस्सा लिया । इनमे लगभग एक तिहाई भगवान कृष्ण की अपनी नारायणी सेना के सिपाही थे । इस युद्ध में सभी मारे गए । बचे तो सिर्फ़ ग्यारह योद्धा । आठ पांडवों के और तीन कौरव पक्ष के । ज़रा सोचिए हम किनकी संताने हो सकते हैं ? उन चालीस लाख लोगों की या उन ग्यारह लोगों की ? पांडवों को राजगद्दी मिली , उन चालीस लाख लोगों को क्या मिला ? धर्म युद्ध था तो भगवान ने अपने सैनिक भी क्यों मरवाए ? क्या वे सभी सैनिक अधर्मी थे जो मारे गए ? कोई जवाब तो दे कि अपने राजा की आन बान शान पर जान न्योछावर करने वाले सैनिक धर्मी हुए या अधर्मी ? चलिए अधर्मी ही सही , फिर भी कोई नाम तो होगा उनका ? उनके जीने का मक़सद तो उनके साथ गया मगर किस क़सूर के चलते वे मारे गए ?

मन भरमाने को हम ख़ुद को भगवान राम की संतान बेशक कह लें मगर सम्भावना तो यही है कि राम-रावण युद्ध में मारे गए किसी सैनिक की ही हम संतान होंगे । आख़िर कौन थे वे मारे गए सैनिक ? इतिहास कहता है कि शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाया । आपको क्या लगता है हमारा जैविक पिता कौन होगा ? शाहजहाँ अथवा कोई एसा कारीगर जिसके हाथ बादशाह ने कटवा दिए ? देश-दुनिया में हज़ारों इमारतें हैं जिन पर उनके बनवाने वालों के नाम खुदे हैं । क्या ईंट गारा ख़ुद उन कथित महान लोगों ने ढोया था ? राजा-महाराजा ने जनता का पैसा ख़र्च कर मंदिर बनवा दिए और अमर हो गए । मंदिर बनाते समय ऊँचाई से गिर कर मरे मज़दूरों की बात कब होगी ?

बस । अब बहुत हुई राजा महाराजाओं की बात । बहुत हुई पद्मावती , रतनसेन और खिलजियों की बात । अब अपनी बात हो । उत्पातियो के डर से बस में दुबके अपने बच्चों की बात हो । तोड़फोड़ में जाया हुई अपनी दुकानों और सार्वजनिक सम्पत्ति की बात हो । राजा महाराजा मर खप गए । हम अभी हैं तो हमारे अपने दुःख-सुख की बात हो । प्रजातंत्र है तो क्या प्रजा की बात नहीं होनी चाहिए ? प्रजा चाहे तब की हो या अब की । इतिहास तो प्रजा से ही बनता है । जब नहीं है हम में कोई राजसी ख़ून तो मुक्त क्यों नहीं होते हम उनकी मानसिक ग़ुलामी से ? अब किस बात का इंतज़ार है हमें ? क्या नए राजाओं का ? मुकुट वाले नहीं तो टोपी वाले ?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RELATED POST

अविश्वास तेरा ही सहारा

रवि अरोड़ादस साल के आसपास रही होगी मेरी उम्र जब मोहल्ले में पहली बार जनगणना वाले आये । ये मुई…

पैसे नहीं तो आगे चल

रवि अरोड़ाशहर के सबसे पुराने सनातन धर्म इंटर कालेज में कई साल गुज़ारे । आधी छुट्टी होते ही हम बच्चे…

एक दौर था

एक दौर था जब बनारस के लिए कहा जाता था-रांड साँड़ सीढ़ी और सन्यासी , इनसे जो बचे उसे लगे…

चोचलिस्टों की दुनिया

शायद राजकपूर की फ़िल्म 'जिस देश में गंगा बहती है ' का यह डायलोग है जिसने अनपढ़ बने राजकपूर किसी…