प्याज और जूते

रवि अरोड़ा

परी कथाओं सी माणिक सरकार की ईमानदारी के बावजूद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की त्रिपुरा में हार मुझे क़तई हैरान नहीं करती । पूरे मुल्क में दक्षिणपंथ का जो माहौल बना है , उससे त्रिपुरा भी भला कैसे अछूता रहता । अपने मुल्क की ही बात क्यों करें , पूरी दुनिया में भी यही तो हो रहा है । वामपंथ का नशा धरतीवासियों के सर से उतरा है और देश के देश दक्षिणपंथी हो रहे हैं । स्वतंत्रता अथवा पुनरोत्थान आंदोलनों से जुड़ी उदारवादी पार्टियों के हाथों से भी सत्ता एक के बाद एक जा रही है । इसी बयार ने हमारे यहाँ भी कांग्रेस को धूल चटाई है । पूरे और बड़े कैनवास पर देखें तो पूरी दुनिया की अधिकांश आबादी आजकल एक जैसा सोच रही है तथा सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने देश की ही बात करें तो भी साफ़ नज़र आ रहा है कि भारतीय जनमानस अब प्रयोगवादी हो चला है । बेशक आज भी पार्टियों से अधिक वह प्रमुख नेतृत्व के रूप में विराट चेहरे को तरजीह देता है मगर देर सवेर कथनी और करनी का भी मूल्याँकन करता है । शैक्षणिक योग्यता और ख़बरों तक पहुँच बढ़ने से भ्रष्टाचार उसके लिए अब प्रमुख मुद्दा है तो अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण उसे अपने धर्म की झंडाबरदार पार्टी की ओर धकेलता है व अपनी परम्परागत पार्टी बदलने को मजबूर करता है ।

देखते ही देखते देश की कम्युनिस्ट पार्टियाँ निर्दलीय उम्मीदवारों जितने वोटों पर आ गई हैं । शुरुआती लोकसभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होती थी मगर दल में विभाजन और स्पष्ट नीतियाँ ना होने के कारण वामपंथी सिमटते ही चले गए । आज देश की तमाम वामपंथी पार्टियों के वोट मिला

लें तो साढ़े चार फ़ीसदी भी नहीं होते । जबकि इससे अधिक वोट लोकसभा चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी ले आते हैं । गठन के बयानवे साल बीतने के बावजूद कम्युनिस्ट भारतीय नायक नहीं खोज पाए और आज भी अपने कार्यालयों में कार्ल मार्क्स , लेनिन , माओ और स्टालिन की ही तस्वीरों से काम चला रहे हैं । किसान-मज़दूर की बात करने वाले किसान आंदोलन कभी शुरू ही नहीं कर पाए और मज़दूर आंदोलनों के नाम पर सिर्फ़ ट्रेड यूनियन जैसे वसूली केंद्र ही खोले बैठे हैं । ख़ास बात यह है कि कार्ल मार्क्स के सिद्धांत के अनुरूप वे आज भी मध्य वर्ग को कुछ नहीं मानते जबकि लोकतंत्र का माई-बाप अब यह मध्यवर्ग ही है ।

उधर कांग्रेस की दुर्गति भी देखने लायक है । पहली लोकसभा में उसे 45 फ़ीसदी वोट मिले थे जो अब घटकर केवल 19 फ़ीसदी रह गए हैं । वर्ष 67 से पहले देश की सभी विधान सभाओं में भी उसकी सरकारें थीं और आज़ादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का दशकों तक जनता जनार्दन ने उसे भरपूर ईनाम दिया । आपातकाल से नाराज होकर ढाई साल के लिए हटाया मगर पुनः उसी पर विश्वास किया मगर अब एक के बाद एक घोटालों और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण ने पब्लिक को उन्ही हिंदू महासभाई उर्फ़ जनसंघी उर्फ़ भाजपाई खेमे में ला खड़ा किया जिसे वर्ष 1984 में मात्र दो सीटें उन्होंने दी थीं । शुरुआती लोकसभा चुनावों में मतदाता भगवा वालों के बूथ पर ही नहीं जाता था और गांधी के हत्यारे कह कर हिक़ारत से देखता था । गांधी नेहरू की पीढ़ी के दुनिया से विदा होने के बाद कांग्रेसी घोटालों के युग में आँख खोलने वालों को अब उसी भगवा खेमे में ला खड़ा किया जहाँ उनके बाप दादा फटकते भी नहीं थे । भगवा ध्वज के नीचे देश की 31 फ़ीसदी आबादी को लाने में लोहिया और अम्बेडकर वादियों के बेईमान नेतृत्व व मुस्लिमों की ही चटकारिता करने वाली ख़ानदानी क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका भी कम नहीं है ।

कुल मिला कर कहें तो आज देश एक नई राह पर खड़ा है । बेशक मुल्क ने यह जिस इरादे से किया है वह नेक है मगर जिनके भरोसे किया है उनके नेक इरादों की परीक्षा अभी होनी बाक़ी है । हालाँकि हमारा देश कभी भी प्रयोगधर्मी नहीं रहा मगर अपने नए नवेले लोकतंत्र में तो वह नित नए प्रयोग ही कर रहा है । वैसे निराशा में वह नहीं कहता कि अब तक तो जो भी दोस्त मिले बेवफ़ा मिले मगर इतना डर तो उसे भी लगता ही होगा कि कहीं प्याज़ के बदले जूते ना खाने पड़ें । अब प्रयोग तो प्रयोग ही है । कुछ भी हो सकता है ।

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