पेहवा

रवि अरोड़ा

भांजे हितांशु बहल की अकस्मात् हुई मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा की शांति के लिए हाल ही में परिवार के लोग पहोवा यानि पेहवा गए थे । बड़ों के निर्देश पर मैं भी उनके साथ था । कुरुक्षेत्र के निकट के इस तीर्थ स्थान पर दुनिया भर से हिंदू धर्म के अनुयायी मृतकों की गति कराने अथवा पिंडदान को आते हैं । कहा जाता है कि महाभारत के बाद सभी मृत योद्धाओं का पिंडदान पांडवों ने यहीं किया था । वैसे अनेक पुराणों में भी इस स्थान का उल्लेख पृथुदक के नाम से है । कहा जाता है कि राजा पृथु ने अपने पिता का पिंड दान यहीं किया था अतः इस स्थान का नामकरण भी उन्ही के नाम से हुआ । यहाँ एक प्राचीन मंदिर भी है जिसे साढ़े चार हज़ार साल पुराना बताया जाता है । मंदिर के साथ ही एक सरोवर है जिसे सरस्वती नदी का अंश कहा जाता है । लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी की खोज में पिछले दिनो इसके आस पास खुदाई का काम भी हुआ था । ख़ैर ।

जानकार लोगों ने पहले ही आगाह कर दिया था कि यहाँ के पुरोहित यजमानों को जम कर लूटते हैं । सचमुच वहाँ एसे ही हालात दिखे और सैंकड़ों की संख्या में पुरोहित अपने अपने चेंबर सजाए दिखाई पड़े । चूँकि यहाँ अधिकतर पंजाब और आसपास के लोग ही आते हैं अतः पुरोहितों ने अपने अपने इलाक़े बाँट रखे हैं और अपने अपने चेंबरों पर पंजाब के उन शहरों के नाम भी लिखे हुए हैं । हर आगंतुक से उसके पूर्वजों का इलाक़ा और उनके नाम जान कर उसे किसी ख़ास पुरोहित के हवाले कर दिया जाता है जो पिंडदान के लिए कभी आए उसके पूर्वजों के नाम पते अपने बही खाते से खोज कर बता देता है । उसके बाद आत्मा-परमात्मा का ख़ौफ़ दिखाकर अच्छा ख़ासा लूट भी लिया जाता है । मंदिर और सरोवर के साथ ही दो एतिहासिक गुरुद्वारे भी हैं । गुरुद्वारा शीश महल और गुरुद्वारा बाउली साहब । दोनो गुरुद्वारे भी बेहद पुराने हैं और उनकी दीवारों पर बड़ा बड़ा लिखा हुआ है सन 1507 में अपनी प्रथम उदासी यदि देशाटन के बाद गुरु नानक देव जी यहाँ आए थे और लोगों को अपने पूर्वजों का पिंडदान करते देख कर उन्होंने लोगों को एसा ना करने की शिक्षा भी दी थी । उन्होंने कहा था-नानक अग्गे सो मिले , जो खट्टे घाले देह यानि किया हुआ पिंडदान मृतक तक नहीं पहुँचता वरन किए हुए अच्छे कर्म ही उस लोक में साथ देते हैं । मुख्यमार्ग पर स्थित इन गुरुद्वारों में यह भी लिखा हुआ मिला कि 1567 में गुरु अमरदास जी ,1616 में गुरु हरगोविंद जी और 1675 गुरु तेग़बहादुर सिंह जी भी यहाँ आए थे और लोगों को कर्मकांडों में फँसने की बजाय अच्छे कर्म करने की शिक्षा दी थी । हैरानी की बात है कि बावजूद इसके आज भी पेहवा में बड़ी संख्या में सिख धर्म के अनुयायी पिंडदान के लिए आते हैं । गुरुओं की मनाही के बावजूद और एसे उनके निर्देशों से सजे गुरुद्वारों के ठीक बग़ल में बैठ कर ही सभी कर्म कांड निपटाए जाते हैं । ज़ाहिर है पूजापाठ के बाद ये लोग माथा टेकने गुरुद्वारे भी ज़रूर जाते होंगे । उधर सिख धर्म के अनुयायी ना होते हुए भी कर्मकांड को आए अन्य श्रद्धालु भी प्राचीन गुरुद्वारों के बाबत जान कर यहाँ माथा टेकने चले आते हैं । हैरानी की बात है कि गुरुओं को श्रद्धा से नमन और उनके निर्देशों की अवहेलना एक साथ होती है । ख़ास बात यह भी है कि इन चैम्बरों के ठीक सामने गुरुओं की कर्म कांड ना करने की शिक्षा लिखी हुई है और उधर गुरुद्वारों के पाठियो और अनुयायियों के ठीक सामने सैंकड़ों सालों से कर्मकांड का बाज़ार सज़ा है मगर किसी को भी एक दूसरे की उपस्थिति से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता । बीमारी और इलाज दोनो का अजब सामंजस्य देखना हो तो पेहवा से बेहतर कोई और जगह नहीं हो सकती । ना जाने कैसी कैसी विसंगतियों से भरे हैं हम । पेहवा से लौटते हुए मैं इस सवाल के ही हवाले रहा कि पाखंडों से मुक्त होने को हमें अभी और कितने संत, उपदेशक , धर्मगुरु अथवा सतगुरु चाहिये ? क्या हम पर कभी किसी परम पुरुष के संदेश का असर होगा भी अथवा नहीं ?

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