पीछे छूटते लोग

रवि अरोड़ा

क़व्वाली सुनने की ग़रज़ से अक्सर मैं हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चला जाता हूँ । एक बार पत्नी के साथ गया तो पता चला कि दरगाह के भीतर महिलायें नहीं जा सकतीं । पत्नी ने बाहर से ही हाथ जोड़ लिए । एसा ही कुछ महाराष्ट्र के शनि शिंगनापुर और पुष्कर के कार्तिकेय मंदिर में भी हमारे साथ हुआ था । ज़ाहिर है यह सब देखकर बुरा तो ख़ूब लगा मगर धार्मिक व्यवस्थाओं के आगे हम जैसों की क्या बिसात, सो चुपचाप झेल गया । हालाँकि यह सवाल तब भी मन में आया था कि महिलाओं का बराबरी का संवैधानिक अधिकार इन धार्मिक स्थलों पर काम क्यों नहीं करता मगर इस पर बात करने का कभी मौक़ा ही नहीं मिला । मगर अब जब सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर बवाल मचा है तो मेरा मन भी हिलोरे मारने लगा है और मी टू अभियान की तरह वर्षों बाद कुछ सवाल साँझा करने को आतुर है ।

कहते हैं कि एक पीढ़ी का पाखंड अगली पीढ़ियों के लिए परम्परा बन जाता है । हमारी अधिकांश परम्पराएँ भी इसी पाखंड से जन्मी हैं और अब ठोस व्यवस्था का रूप ले चुकी हैं । सामाजिक-धार्मिक व्यवस्थाएँ भी एसी कि संविधान, क़ानून और सर्वोच्य न्यायालय को ही चुनौती दे रही हैं । सर्वोच्य न्यायालय के फ़ैसले के बावजूद सबरीमाला मंदिर में दस से पचास वर्ष की महिलाओं को न घुसने देने वाले इन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्थाओं के संवाहक हैं तो वोट के भूखे राजनीतिक लोग इसके पोषक । तभी तो अमित शाह जैसे देश की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के अध्यक्ष सर्वोच्य न्यायालय को सलाह दे रहे हैं कि एसे फ़ैसले न सुनायें जिन पर अमल न हो सके । शाह दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी अयप्पा भक्तों के साथ है और सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के ख़िलाफ़ । हो सकता है कि शाह, उनकी पार्टी और अयप्पा भक्तों के लिए मंदिर में महिलाओं के प्रवेश प्रमुख मुद्दा हो मगर मेरा मन तो इसी सवाल के हवाले है कि यह देश क़ानून और संविधान के अनुरूप चलेगा अथवा परम्पराओं के ? परम्परायें तो सदैव पीछे ले जाती हैं जबकि विज्ञान आगे । उधर, किसी देश का क़ानून और संविधान उसे वर्तमान के अनुरूप तैयार करता है । परम्पराएँ तो हमने बाल विवाह , बलि प्रथा , सती प्रथा , विधवा विवाह की मनाही , बहु विवाह और पर्दा जैसी भी अपने पूर्वजों से पाईं थीं मगर कुछ को हमने ख़ुद ही त्याग दिया और कुछ को क़ानून के दबाव में हमने छोड़ दिया। बेशक हमारे बुज़ुर्गों ने अच्छी और महत्वपूर्ण परम्परायें भी हमें ढेरों दी हैं और हम उनका अक्षरश पालन भी कर रहे हैं मगर एसी तो बहुत कम ही हैं जो संविधान और क़ानून के ख़िलाफ़ हमें खड़ा करती हों । फिर कुछ लोग एसी परम्पराओं की आढ़ में ख़ुद को सर्वोच्च न्यायालय से भी बड़ा क्योंकर समझ रहे हैं ?

सवाल यह भी है कि पीरियड के दौरान मंदिर में न जाने का फ़ैसला हम महिलाओं पर क्यों नहीं छोड़ सकते ? बेशक आप इसे संस्कार कहे अथवा युगों युगों से अवचेतन में रच बस गई सोच मगर अधिकांश महिलायें एसा स्वतः करती भी हैं । कुछ रजस्वला महिलायें मंदिर में प्रवेश करती हैं तो अपराध बोध में ही रहती हैं । रसोई और सामाजिक आचरण में भी रजस्वला महिलाओं ने अपने लिए दादी-नानी और माँ से सुने नियम-क़ानून बना रखे हैं और आज भी वे उसकी लक्ष्मण रेखा नहीं लाँघतीं । हो सकता है कि आने वाले समय में महिलायें अपनी इस सोच से जुड़े सवालों के जवाब खोज लें और एसे किसी निर्णय पर पहुँच जायें कि उन्हें अपने कठिन दिनों में मंदिर जाना चाहिए अथवा नहीं मगर यह फ़ैसला समाज के चंद ठेकेदार करें , यह कहाँ तक उचित है ? कोई उन्हें बताता क्यों नहीं कि जिस प्राकृतिक प्रक्रिया को वे अपवित्र मान रहे रहे हैं , वह उनके जन्म से भी जुड़ी है और संतानोत्पत्ति जैसे प्रकृति के सबसे बड़े उपहार की द्योतक है । ज़माना बदल रहा है । वर्जित माने जाने वाले इस विषय पर पैडमैन जैसी फ़िल्में बन रही हैं और ख़ूब पसंद भी की जा रही हैं । एक दौर था कि सेनिटरी नेपकिन के विज्ञापन के लिए कोई बड़ी सिने तारिका तैयार नहीं हुई थी और रेणुका शाहणे जैसी कम चर्चित टीवी एक्ट्रेस से निर्माता कम्पनी को विज्ञापन करवाना पड़ा था । मगर आज तमाम बड़ी फ़िल्मी हिरोईनें शान से एसा विज्ञापन कर रही हैं और हर चौथा टीवी विज्ञापन सेनिटरी नेपकिन का होता है । ज़माना अभी और बदलेगा और यक़ीन मानिये अमित शाह और उनकी जैसी सोच के लोग कहीं पीछे छूट जाएँगे या फिर अपनी सोच पर शर्मिंदा होंगे । आप देखते जाइये ।

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