पिटारे में नया क्या

रवि अरोड़ा
क़ोरोना काल में यूट्यूब का बड़ा सहारा है । घर बैठे ही पता चलता रहता है कि दुनिया भर में क्या नया सोचा जा रहा है । शुरू शुरू में लगता था कि संकट की इस घड़ी में धर्म कर्म बढ़ जाएगा । आम दिनो के मुक़ाबले अब लोगबाग़ अधिक पूजा पाठ करेंगे मगर एसा नहीं हुआ । आश्चर्यजनक रूप से दुनिया में नास्तिकता दो कदम और ही आगे बढ़ी है । हैरानी का विषय यह भी है कि पढ़े लिखे मुस्लिम भी अब इस्लाम की बातों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कस कर देखने लगे हैं । कूपमंडूक पाकिस्तान में भी एसे लोगों की कमी नहीं । स्वयं को फ़्री थिंकर कहने वाले एसे अनेक युवा मुस्लिम सामने आये हैं जो छद्म नामों से इस्लाम की विसंगतियों पर सोशल मीडिया पर लेख लिख रहे हैं । अनेक अपने चेहरे को ढक कर फ़ेसबुक आदि पर लाइव सेशन भी करते हैं और विज्ञान का सहारा लेकर जम कर अपने धर्म का मज़ाक़ उड़ाते हैं । पाकिस्तान छोड़कर जर्मनी व आस्ट्रेलिया में जा बसे ग़ालिब कमाल और हेरिस सुल्तान जैसे विद्वान भी सामने आए हैं जिनके समक्ष बड़े से बड़ा मौलवी भी नहीं टिक पाता । ख़ास बात यह है कि भारत में भी इन युवाओं के चाहने वालों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है और असंख्य लोग अपने अपने सवाल लेकर लाइव सेशन में अपनी बारी का इंतज़ार करते रहते हैं ।
एक सर्वे के मुताबिक़ दुनिया भर में लगभग सोलह परसेंट लोग नास्तिक हैं । बेशक धरती पर इंसानी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है मगर प्रतिशत में गिनें तो हर साल लगभग दो फ़ीसदी नास्तिकों की संख्या बढ़ रही है । इसका यह अर्थ क़तई नहीं है कि आने वाले पचास सौ सालों में दुनिया भर से धर्म का डेरा उठ जाएगा मगर आने वाले समय में धार्मिक लोग अल्पसंख्यक होंगे इसमें कोई दो राय नहीं । तमाम सर्वे बताते हैं कि जिस भी देश अथवा समाज में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुरक्षा अधिक है वहाँ धर्म की भूमिका सीमित हो जाती है । जापान, कनाडा, ब्रिटेन,फ़्रांस,जर्मनी,चेक,साउथ कोरिया और नीदरलैण्ड जैसे मुल्क जो सौ साल पहले पक्के धार्मिक होते थे मगर अब वहाँ की आधी से अधिक आबादी नास्तिक है । यही नहीं पिछले पचास साल में दुनिया का एक भी एसा देश सामने नहीं आया जहाँ धार्मिक लोग बढ़े हों । यही नहीं शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा का स्तर बढ़ने से आध्यात्मिक माने जाने वाले देश भारत में भी नास्तिकों की तादाद धीरे धीरे बढ़ रही है । हालाँकि सर्वे के मुताबिक़ यहाँ एक फ़ीसदी लोग भी एसे नहीं हैं मगर जिस तेज़ी से युवा पीढ़ी धार्मिक रीति रिवाजों और कर्म कांडों से दूर जा रही है , पता नहीं कब यह उसे नास्तिकता की ओर ले जाये ।
मानवीय इतिहास में धर्म की भूमिका पर ज़माने से बहस हो रही है । कुछ धर्म को बढ़ा चढ़ा कर आँकते हैं तो कई विद्वान यह भी दावा करते हैं कि इंसान द्वारा इंसान के शोषण में धर्म ने सदैव हथियार का काम किया है । कपोल कल्पनाओं और हवा हवाई कहानियों के नाम पर हज़ारों साल तक इंसान को सत्य से दूर रखा गया मगर विज्ञान ने ज्यों ज्यों अपने कदम बढ़ाये अंधेरा छँटता चला गया । आस्तिकता बनाम नास्तिकता की यह बहस कितनी मौजू अथवा ज़रूरी है यह मैं नहीं जानता मगर इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता कि विज्ञान ने उन सभी कहानियों को तो झुठला ही दिया है जो सभी धर्मों में बिखरी पड़ी हैं । उधर, इस कोरोना संकट के दिनो में जिस प्रकार सभी धार्मिक स्थलों पर ताले लगे और इंसानी दुनिया देवताओं की मूर्तियों और धार्मिक किताबों की बजाय डाक्टरों की ओर आशा से देखने लगी उससे तो यही लग रहा है कि यक़ीनन धर्म की इंसानी बुद्धि पर पकड़ कुछ ढीली हुई है । रही सही कसर ईद, शिवरात्रि और जगन्नाथ रथ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजनों के बिना भी जीवन के निर्बाध चलने ने पूरी कर दी । एक सवाल मेरे मन में यह भी आता है कि नब्बे के दशक में राम मंदिर के नाम पर देश को जिस तरह झकझोरा गया क्या यह आज 2020 में सम्भव होता ? शुक्र है कि राम मंदिर का अब शिलान्यास होने जा रहा है और यह मुद्दा अब कोई महत्व नहीं रखता । लेकिन सवाल यह भी है कि वे राजनीतिक शक्तियाँ धर्म के अपने हथियार को यूँ आसानी से कुन्द होने देंगी या अपने पिटारे से फिर कुछ नया निकलेंगी ?

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