पलाश

रवि अरोड़ा

आजकल दिल्ली में कहीं से भी गुज़र जाइए एक ना एक पलाश का वृक्ष अपनी नौकरी बजाता आपको ज़रूर दिखाई देगा । बिना किसी देखभाल, पानी और खाद के पूरे फागुन और चैत के महीने हमारी आँखों को ठंडक देने वाली पलाश की यह मौजूदगी भी ग़ज़ब है । आख़िर किसने लगाए पूरी दिल्ली में पलाश ? मेरे अपने शहर समेत पूरे उत्तर भारत में भी तो हैं पलाश मगर कौन रोपता है इन्हें और क्यों ? चटक लाल फूल । कहीं कहीं कुछ हल्के लाल तो कहीं बेहद गहरे । सारे साल पता ही नहीं चलता कि हमारे इर्द गिर्द पलाश मौजूद है । ढाक के तीन पात जैसे मुहावरे दिन भर बोलते रहने के बावजूद ढाक के इस पेड़ पर किसी की निगाह ही नहीं जाती । पता नहीं कहाँ छुपा रहता है ये ? पत्तियों के अतिरिक्त कोई फूल दिखता भी तो नहीं और अब देखिए सभी पत्तियाँ जैसे फूलों में तब्दील हो गईं । पूरे पेड़ पर जैसे फूल ही फूल ।

जब छोटा था तो मोहल्ले के कुछ बुज़ुर्ग होली के दिन टेसु के फूलों से रंगीन पानी बनाते थे और वही एक दूसरे पर डालते थे । हम बच्चों के सिन्थेटिक रंगों के आगे बुज़ुर्गों का यह पीला और हल्के लाल रंग का पानी बेहद फीका लगता था । हम बच्चे इन बूढ़ों और उनके रंग का मज़ाक़ भी उड़ाते थे । कुछ बड़ा हुआ तो पता चला कि पलाश के फूल ही टेसु हैं और क़ुदरत जैसे हमें होली के लिए ही फागुन के महीने में इस पेड़ पर फूल देती है । चालीस पचास फ़ुट ऊँचे पेड़ से फूल तोड़ते हुए हम कहीं गिर ना जायें , इस लिए पलाश होली के दिनों अपने फूल स्वतः ही नीचे फेंकने लगता है । पलाश मेरे इर्द गिर्द शुरू से था मगर मैं उससे अनजान ही रहा । अब पता चला कि वैद्य जी जिनसे हर मर्ज़ के लिए बचपन में दवा की पुड़िया हम लाते थे , वे उसे पलाश से ही बनाते थे । जिस खाट पर दशकों सोए उसकी रस्सी में नारियल के साथ पलाश के रेशे भी थे । कोई कहता है कि इससे पान का कत्था भी बनता है तो कोई इसकी और कई सिफ़तें बयान करता है ।

पलाश के नीचे खड़ा सोच रहा हूँ कि पलाश तो कुछ दिनों में चला जाएगा , फिर मेरे पास क्या रहेगा ? क्या कोई और विकल्प है मेरे पास ? बेशक इतने ही ख़ूबसूरत गुलमोहर और अमलताश के फूल मेरे जीवन में दोबारा आने वाले हैं मगर जेठ का महीना तो अभी दूर है , तब तक क्या करूँ ? मुट्ठी में बाँध लूँ इसे ? रोक लूँ इसे ? मगर क्या यह सम्भव है ? कुछ ही दिनो में गिर जाएँगे इसके सारे फूल और पेड़ पर टंगे जितने सुंदर हैं ये फूल वहीं नीचे गिरे हुए पक्षियों की लाशों का सा गुमान देते हैं । ज़िंदा और मुर्दा फूल में इतना अंतर ? क्या जीवन की शृणभंगुरता का संदेश देने आता है पलाश ?

एक सवाल और । भागमभाग के इस दौर में अपनी उपेक्षा कैसे झेलता होगा पलाश ? कोई उसकी ओर नहीं देखता । मैं भी पहले कहाँ निहारता था उसे । बहरहाल पलाश पलाश है और अब कभी नज़र आएँ तो रुक कर देखिएगा ज़रूर । आपको तो अच्छा लगेगा ही , पलाश भी ख़ुश होगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RELATED POST

ठहरे हुए लोग

रवि अरोड़ाबचपन से ही माता पिता के साथ गुरुद्वारों में माथा टेकने जाता रहा हूं । गुरुद्वारा परिसर में किसी…

मुंह किधर है

रवि अरोड़ाआज सुबह व्हाट्स एप पर किसी ने मैसेज भेजा कि हिंदुओं बाबा का ढाबा तो तुमने प्रचार करके चला…

जहां जा रही है दुनिया

रवि अरोड़ामैने सन 1978 में एम एम एच कॉलेज में एडमिशन लिया था । पता चला कि कॉलेज में एक…

देखो एक नदी जा रही है

रवि अरोड़ासोशल मीडिया पर सुबह से डॉटर्स डे के मैसेज छाए हुए हैं । इन मैसेज के बीच हौले से…