पपीता बनाम जिन्ना

रवि अरोड़ा

मैं फलों का बेहद शौक़ीन हूँ । मेरे कुछ तयशुदा ठेलीवाले हैं , जिनसे मैं फल ख़रीदता हूँ । कल कुछ अजब हुआ । पपीते की ठेली वाला हाफ़िज़ भाई बोला-भाई साहब अब आप पपीता खाना बंद कर दो । मुझे बड़ी हैरानी हुई कि दुकानदार ही अपना माल ना ख़रीदने की सिफ़ारिश क्यों कर रहा है ? इस बाबत जब मैंने पूछा तो उसका जवाब और भी हैरान करने वाला था । वह बोला- अज़ी ससुरे पता नहीं कैसे कैसे पका रहे हैं । निरा ज़हर है । हमारी तो मजबूरी हैं पर अपने आदमी को देते हुए ज़ोर पड़ता है । इस पर मैंने कहा कि पपीता छोड़ कर तुम भी कुछ और क्यों नहीं रख लेते तो वह बोला-अज़ी क्या बेचे , और चीज़ों में कौन सा अमृत मिला हुआ है । जिसे हाथ लगाओ , वही फ़र्ज़ी है , कुछ छोड़ा भी तो नहीं । घर लौटते हुए मैं अपने उन तमाम मित्रों की बातें याद करता हुआ आया जो खाने पीने से जुड़ी चीज़ों का व्यवसाय करते हैं । लगभग सभी तो एसी बातें करते हैं । आम बेचने वाले आम नहीं खाते और केले वाले केला । सब्ज़ी वालों का सब्ज़ियों से विश्वास उठा हुआ है और अनाज वालों का अनाज से । यानि जो जितना नज़दीक से देख रहा है वह उतना ही डरा हुआ है मगर हम जैसे लोग जो वस्तुस्थिति से अनजान हैं , वे मानने ही नहीं कि जो दम गाफ़िल सो दम काफ़िर ।

जब बच्चा था तब घर में घुसते ही बता देता था कि कौन सी सब्ज़ी आज बनी है । अब खाते हुए भी बताना मुश्किल होता है कि क्या खा रहे हैं । खाने पीने की वस्तुओं का रंग रूप तो सँवरा हुआ है मगर स्वाद ग़ायब है । छः ऋतुओं के छः तरह के ही फल पहले मिलते थे । अब सब कुछ बारहमासी है । ओक्सिटोसिन का इंजेक्शन लगा कर रातों रात सब्ज़ी उग आती है और कैलशियम कार्बाइड , आर्सेनल, डायल्डून , डीडीआई और डायओकसिन के घोल से कच्चे फल झटपट रंगीन और चमकदार हो जाते हैं । अनाज और दालों में का भी यही हाल है । हर चीज़ प्लास्टिक में बिक रही है , चाहे ठंडी हो या गर्म । विदेशी ही नहीं देशी फलों पर भी मोम का लेप चढ़ाया जाने लगा है । छिलका उतारो तो विटामिन से हाथ धोओ और ना उतारो तो सेहत से । धोते धोते सब्ज़ी , अनाज और फलों का सत्व बेशक ख़त्म हो जाए मगर रसायन नहीं निकलते । डिब्बा बंद चीज़ों और बेकरी की चीज़ों में भी मानक से कई गुना अधिक रसायनों की मिलावट की ख़बरें आए दिन उजागर हो रही हैं । अंडा एंटीबायटिक खिला कर पैदा हो रहा है तो कोला पेय पदार्थ को टायलेट क्लीयर ही बताया जा रहा है । अब बाज़ार में सब्ज़ी फलों से रसायन निकालने के टोटके भी आ गए हैं । पता नहीं वे कितने कारगर हैं मगर बाज़ार तो बाज़ार है और हम तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना के भाव में हैं । जानकार बता रहे हैं अमेरिका और यूरोप के मानकों की नक़ल कर हम फ़ूड सेफ़्टी स्टैंडर्ड तो बना रहे हैं मगर उनके पालन के बाबत हम कभी सोचते ही नहीं । हमारी इसी आपराधिक लापरवाही का फ़ायदा विदेशी कम्पनियाँ उठा रही हैं और अपना कबाड़ हमारे बाज़ारों में धड़ल्ले से खपा रही हैं ।

अपने भोजन से हो रहे खिलवाड़ से मैं बेहद डरा हुआ हूँ मगर पता नहीं क्यों मेरे इर्दगिर्द की दुनिया मुझे बेवक़ूफ़ समझ रही है । इसे लगता है कि मुझे पपीते पर नहीं जिन्ना पर बात करनी चाहिए जिससे आज देश को सबसे बड़ा ख़तरा है । उसका मानना है कि देश बँट रहा है और मुझ जैसे जाहिल लोग अभी भी अपने पेट पर ही अटके हुए हैं । उसकी नज़र में छोटी-छोटी बातों से बड़े लक्ष्य में रुकावट आती है और देश को आगे ले जाने के लिए मुझे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और उस जैसी सभी गतिविधियों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए । हालाँकि अपनी इस दुनिया से प्रभावित होकर बीती रात मैंने भी जिन्ना के बाबत सोचने का भरपूर प्रयास किया मगर हाय रे ये पेट । ध्यान बार बार पपीते वाले की बात की ओर ही चला जाता था । जिन्नावालों मुझे मुआफ़ करना । मैं छोटी छोटी बातों से आगे नहीं बढ़ पा रहा ।

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