नृप के चुनाव की नई शैली

रवि अरोड़ा
जमाने से पढ़ते आ रहे हैं “कोउ नृप होइ हमैं का हानी ” । चुनाव की वेला में खुद को निर्विकार साबित करने के लिए बड़े बड़े काबिल इसे ब्रह्म वाक्य की तरह स्तेमाल करते हैं । राजनीतिक पक्षधरता के आरोप से बचने को मैं भी अक्सर इस चौपाई को दोहराया करता था । मगर एक बार किसी सयाने से टोक दिया । उसने पूछा कि क्या आपको मालूम है कि राम चरित्र मानस में गोस्वामी तुलसी दास किस के मुख से यह कहलवाते हैं ? मेरे इनकार करने पर उन्होंने बताया कि कैकई की मति भ्रष्ट करने के लिए उसकी दासी मंथरा ने ही कहा था – “कोउ नृप होइ हमैं का हानी ;चेरि छाड़ि अब होब की रानी”। यानी सत्ता का पूरा तख्तापलट करवाने लिए एक षड्यंत्रकारी दासी ही कहती है कि राजा कोई भी हो हमें कोई लेना-देना नहीं, मैं तो दासी की दासी ही रहूंगी , रानी आप सोचो आप का क्या होगा ? हालांकि दासी मंथरा भी भली भांति जानती थी कि उसकी मालकिन कैकई का पुत्र भरत राजा बना तो उसमें वह अधिक लाभान्वित होगी न कि कौशल्या पुत्र राम के राजा बनने पर । इस चौपाई का अर्थ और मंतव्य जानने के बाद कसम से – “कोउ नृप होइ हमैं का हानी’ का भाव ही न जाने कहां गुम हो गया । उसके स्थान पर यह भाव जन्मा कि राजा कौन बनेगा जब इससे सरासर फर्क पड़ता है तो मंथरा सा अभिनय क्यों , खुल कर अपनी पसंद नापसंद जाहिर क्यों न की जाए ?

लीजिए मैं अभी राजनीतिक पसंद नापसंद को खुल कर व्यक्त करने की बात ही कर रहा हूं और उधर ऐसी खबरें मिलनी भी शुरू हो गई हैं । पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक दर्जन से अधिक विधान सभा क्षेत्रों में जनता ने अपने प्रत्याशियों को दौड़ा लिया है । बंगाल के खेला हौबे की तर्ज पर यहां खदेड़ा हौबे हो रहा है । कहना न होगा कि जिन्हें खदेड़ा जा रहा है उनमें से अधिकांश भाजपा विधायक हैं और जहां जहां से उन्हें खदेड़ा गया वे किसान अथवा जाट बहुल क्षेत्र हैं । हालांकि अलीगढ़ जैसे शहर में विरोध तो सपा प्रत्याशी का भी हुआ मगर लोगों का गुस्सा अधिकांशत भाजपा प्रत्याशियों पर ही निकल रहा है । महंगाई, बेरोजगारी, कोरोना की दूसरी लहर के दौरान नाइंतजामी से तो लोगों में आक्रोश है ही साथ ही किसान आंदोलन के दौरान किए गए अपमान से भी लोगबाग कुपित हैं । विधायक ही नही उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी इस विरोध प्रदर्शनों का शिकार हो गईं । अभी तो पहले चरण का भी मतदान नहीं हुआ और अभी से पब्लिक “कोउ नृप होइ हमैं का हानी ” को नकार रही है , आगे पता नहीं क्या क्या होगा ?

पिछले पैंतीस सालों से चुनावों को नजदीक से देखता आ रहा हूं । प्रत्याशियों के प्रति लोगों में गुस्सा सामान्य सी बात है । जीते हुए पुराने प्रत्याशियों के अपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर लोग कुपित होते ही हैं मगर इस बार का विरोध कुछ अलग सा ही है । यह विरोध इक्का दुक्का विधानसभा क्षेत्रों तक भी सीमित नहीं दिख रहा । इस बार का गुस्सा एक किस्म की सामूहिकता लिए हुए है और खास बात यह है कि कोई खास राजनीतिक दल भी इसके पीछे नहीं लगता । पता नहीं आपका क्या विश्लेषण है मगर मुझे तो लगता है कि जनता अब खुद को बेवकूफ समझे जाने से ज्यादा नाराज है । हर बार जाति और धर्म के सांचे में डालकर उसका वोट झटक लिया जाता है और बाद में उसे झुनझुना सा थमा देते हैं । अवश्य ही उसे बुरा लगता होगा कि उसके जीने मरने के मामलों पर कोई बात ही नहीं करता । बेशक उसे अपनी जाति का आदमी अच्छा लगता है । यकीनन अपने धर्म का आदमी भी उसकी पहली पसंद होता है मगर उसे उसकी आखिरी पसंद भी राजनीतिक दल मान लेते हैं , यह उसे अब बर्दाश्त नहीं होता । नृप के चुनाव को शायद यही अब उसकी शैली हो ।

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