धीरा सो गम्भीरा

मित्रों , एक दौर था जब कहा जाता था कि उतावला सो बावला , धीरा सो ग़म्भीरा । अब ज़माना बदल गया है । अब उतावला गम्भीर और धीरा बावला माना जाने लगा है । इस मुहावरे के नए प्रतिपादन में राजनीतिक दल सबसे आगे हैं । अब जेएनयू प्रकरण को ही ले लीजिए । जिस मामले को यूनिवर्सिटी की चारदीवारी के भीतर ही निपट जाना चाहिए था , उस पर पूरे मुल्क को झकझोरा जा रहा है । विषय पर चर्चा का कोई हामी नहीं और जिसे देखो वही कोई ना कोई स्टैंड लिए घूम है ।अव्वल तो यह इतना बड़ा मामला नहीं है जो पूरा मुल्क इसमें कूद पड़े , और यदि है भी तो भाइयों पहले पूरे तथ्य तो जान लो । बिना पूरी कहानी समझे कोई राय बना लेना कहाँ तक जायज़ है ? ……कमाल नहीं है क्या कि हर कोई कुछ ना कुछ तय किए बैठा है? पक्ष या विपक्ष । देशभक्त या फिर देशद्रोही । कम्युनिस्ट या फिर संघी । जिसे देखो वही उतावला है । सरकार उतावली है कुछ लोगों को देशद्रोही ठहराने में तो विपक्ष को जल्दी है सरकार को धोबीपाट देने की । छात्र , शिक्षक , पुलिस , वक़ील और पत्रकार सभी किसी ना किसी के पक्ष में ख़म ठोके खड़े हैं । जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया ने क्या क्या कहा था , इससे किसी को कोई मतलब नहीं । उसके भाषण का विडीओ देखने की भी जहमत नहीं उठाई गयी और उठा कर ठूँस दिया सलाखों के पीछे । मुल्क को किसने गाली दी , अभी यह भी शिनाख्त नहीं हुई और पूरा जेएनयू देशद्रोही क़रार दे दिया गया । दिल्ली पुलिस उतावली है क्योंकि उसके मुखिया बस्सी साहब रिटायर होने वाले हैं और जाते जाते केंद्र सरकार की नज़रों में चढ़ना चाहते हैं । ज़ाहिर है उन्हें अगला काम इसी बिना पर तो मिलना है । वक़ील उतावले हैं ख़ुद को देशभक्त और दूसरों को देशद्रोही साबित करने में , सो जिसे देखो उसे पीटे दे रहे हैं । मीडिया का ध्रुविकरण हो ही चुका है , जैसे निष्पक्षता जैसे शब्द पत्रकारिता के शब्दकोश से हटा ही दिए गए हों । सरकार अन्य गम्भीर मुद्दों से पब्लिक का ध्यान हटाने को इतनी उतावली हुई घूम रही है कि हर छोटे बड़े मामले में लंगोट कस लेती है । इस मामले में भी उतावलापना एसा दिखाया की हाफ़िज़ सईद तक के कनेक्शन खोज निकाले गए । सोशल मीडिया के जाँबाज़ तो अपनी पूँछ में आग लगाए ही घूम रहे हैं । कोई भी पल भर के लिए ठहर कर सोचने को तैयार नहीं कि क्या यह इतना बड़ा मुद्दा है ? क्या देश के समक्ष अब और कोई समस्या नहीं बची है ? क्या इस मामले को हवा देने से देश का कुछ भला भी होगा ? क्या राजनीति ही सब कुछ है और राष्ट्रहित के कोई मायने नहीं ?

माना देश की बर्बादी चाहने वाले देशद्रोही ही हैं और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए । एसे लोगों के लिए एक ही जगह होनी चाहिए और वह है सलाखों के पीछे । मगर यह करने के लिए इस मुल्क में क़ानून और पूरा चुस्त दुरुस्त तंत्र है फिर इस मामले में नेता और अन्य लोग क्या कर रहे हैं ? या तो ये सब लोग कहें कि उनका देश के संविधान , क़ानून और व्यवस्था में कोई विश्वास नहीं है या फिर इन्हें यह सब करने से रोका नहीं जाना चाहिए ?

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि मानव मस्तिष्क आलसी होता है और सोच समझ के स्तर पर वह सेट रूट्स बनाता है । इन रूट्स का निर्माण करते हैं आदमी के संस्कार , शिक्षा , परिवेश और इर्द गिर्द के समूह । चीज़ों के प्रति हमारी राय भी हमारी ना होकर हमारे मनस्थल के रूट्स की ही होती है । यही वजह होती है कि अधिकांशत हम मुद्दों को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हैं और उन्ही के मुताबिक़ स्टैंड लेते हैं । तो क्या क्या हमारे अपने विवेक के कोई मायने नहीं ? क्या यूँ ही पूर्वाग्रहो से ग्रसित रहें अथवा इनसे उभरने का प्रयास भी करें ? मनोवैज्ञानिक इसका भी मार्ग बताते हैं और वह है सामने वाले का पक्ष भी समझने की कोशिश करना । अब यदि हम इसके लिए तैयार हों तो हमें बुज़ुर्गों की राय को ही फूल चढ़ाने होंगे और वह है -उतावली छोड़ धैर्य से काम लेना । अधीरा नहीं वरन धीरा बनने में ही भलाई है । मेरी , आपकी, सबकी और सबसे बढ़ कर मुल्क की ।

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