धार्मिक गिरोहबंदी

रवि अरोड़ा
बचपन कविनगर के एफ ब्लॉक में बीता । मोहल्ले में बिना नागा हर मंगलवार रात को किसी न किसी के घर भजन-कीर्तन होता था । आयोजन के लिए मंच तैयार करना, दरियां बिछाना, कीर्तन के लिए ढोलक, हरमोनियम और चिमटा आदि इकट्ठा करना तथा धूप बत्ती करना हम बच्चों की जिम्मेदारी होती थी । कीर्तन में शुरू से लेकर आखिर तक मौजूद तो खैर रहना ही होता था । शायद यही वजह रही कि मुझ जैसी फिसड्डी बच्चे को भी हनुमान चालीसा और अनेक श्लोक अच्छी तरह याद हो गए । मोहल्ले में ही पंडित राम सरन शर्मा जी के यहां आए दिन राम चरित मानस का अखंड पाठ होता रहता था और बड़ों की गैर मौजूदगी में सस्वर मानस भी हम बच्चे लोग पढ़ा करते थे। निकट की मार्केट में एक मुस्लिम दर्जी की दुकान थी । उसका लड़का बहुत अच्छा गाता था और कीर्तन में आकर कभी कभी वह भी गाता था- ए मालिक तेरे बंदे हम …। हां राम नवमी, शिवरात्रि, जन्माष्टमी और हनुमान जयंती आदि पर आयोजन जरूर मंदिर में ही होता था । दिमाग पर बहुत जोर डालता हूं तब भी याद नहीं आता कि इन धार्मिक आयोजनों में कभी कोई जुलूस आदि निकला हो। जुलूस के नाम पर केवल राम बारात ही होती थी और उसकी खुमारी ही पूरे साल रहती थी । तलवारें और त्रिशूल आदि लहराते और लाउड स्पीकर पर उन्मादी गीत बजाते हुए जानबूझ कर मुस्लिम इलाकों में जुलूस निकालने की तो कल्पना भी तब किसी ने नहीं की थी । आज सोशल मीडिया पर तमाम ऐसे वीडियो दिखाई पड़े जिनमे माथे पर भगवा पट्टी बांधे और गले में इसी रंग का पटका पहने हुए हनुमान भक्त हनुमान चालीसा पाठ के दौरान एक दूसरे का मुंह देख रहे हैं । हैरानी हुई कि हनुमान जी के नाम पर ठेकेदारी कर रहे ये लोग चालीसा के एक शब्द का भी उच्चारण नहीं कर पा रहे हैं । वैसे मुझे पूरा यकीन है कि उन्होंने जीवन में कभी राम चरित मानस भी पढ़ना तो दूर देखी भी नहीं होगी । उनकी यह हालत देख कर कसम से अपनी परवरिश पर गर्व से सीना चौड़ा हो गया ।

हनुमान जयंती पर दिल्ली में जो हुआ अथवा राम नवमी पर देश भर से उत्पात की जो खबरें आईं उससे मन खिन्न है । बेशक इसे क्रिया की प्रतिक्रिया कह कर मैं अपराधियों के पक्ष में खड़ा होना नहीं चाहता मगर फिर भी हमें विचार तो करना ही पड़ेगा कि ऐसा पहले क्यों नहीं होता था ? हाल फिलहाल के वर्षों में देश में ऐसा क्या घटित हुआ है कि तमाम मुसीबतों से अलग हिजाब, धर्मांतरण, लव जेहाद, अजान, कश्मीर फाइल्स, शाकाहार और न जाने कौन कौन से गैर जरूरी मुद्दे हमारे लिए सबसे अहम हो गए हैं ? देश कर्ज में डूब गया । सरकारी संपत्तियां कौड़ियों के दाम पर बिक रही हैं । महंगाई ने जनता की कमर तोड़ दी । नौकरियां खत्म होती जा रही हैं । अस्सी करोड़ लोग मुफ्त के राशन के भरोसे हैं मगर फिर भी हम इस पर बात नहीं करना चाहते ? चलिए मत कीजिए । यह आपका हक है कि आप किस मुद्दे को जरूरी समझें और किसे नहीं मगर यह तो पता कर ही लीजिए कि देश में अचानक ऐसा कैसे हो गया कि एक ही तरीके से, एक ही यूनिफॉर्म में , एक जैसे गानों के साथ और एक जैसे हथियारों के साथ शहर शहर कथित तौर पर धार्मिक मगर पूर्णतः उन्मादी जुलूस कैसे निकले ? और वह भी इस जिद के साथ कि मस्जिदों पर भी भगवा झंडा लगाएंगे ? पता तो करना चाहिए कि मुसलमानों ने हाल फिलहाल में ऐसा क्या गुनाह कर दिया कि साधुओं के भेष में गुंडे अब मुसलमानों के नरसंहार करने और उनकी बहु बेटियों से बलात्कार करने की बात कर रहे हैं ? और कोढ़ में खाज यह कि इतना कुछ होने पर भी सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग चुप हैं ? कसम से समझ नहीं आ रहा कि ये गिरोहबंदी यदि धर्म है तो वह क्या था जिसे बचपन में मैंने अपने मोहल्ले में देखा था ?

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