धर्म की गठरी में लागा चोर
रवि अरोड़ा
मेरे एक मित्र अब नमस्कार की जगह जय गुरू जी कहने लगे हैं। अभिवादन के लिए इससे पहले वे राम राम कहा करते थे । पता चला कि उनकी धार्मिक आस्थाएं अब छतरपुर वाले गुरू जी से जा जुड़ी हैं। पूछने पर अपने गुरू जी की जो सिफतें उन्होंने बताई, उनमें प्रमुख तो यही थी कि जीते जी उन्होंने कभी किसी से दान आदि नहीं मांगा और उनके डेरे में अभी भी चढ़ावा, चंदा और दान आदि पर जोर नहीं दिया जाता । राधा स्वामी व निरंकारी जैसे मिलते जुलते अन्य डेरों की भी यही एक प्रमुख सिफत बताई जाती है । तो क्या इसका यह अर्थ निकाला जाना चाहिए हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और अन्य कई राज्यों में डेरों और उनसे जुड़े लोगों की बढ़ती संख्या का एक कारण यह भी है कि सनातनी मंदिरों में बढ़ती चढ़ावे और वसूली की प्रथा से उकताए लोग अब अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन डेरों की और आकर्षित हो रहे हैं ?
मूलतः सिख धर्म और आर्य समाज में आस्था रखने वाले उत्तरी भारत के वे करोड़ों लोग जो सनातनी मंदिरों से भी जुड़े थे, धीरे धीरे इनसे विमुख होते जा रहे हैं। मुल्क में सौ करोड़ की हिन्दू आबादी के एक बड़े हिस्से का परंपरागत मंदिरों और उनके आडंबरों से छिटकने का प्रमुख कारण हालांकि आज भी जातीय बंधन से बगावत माना जाता है मगर उसमें अब कई अन्य कारण भी आ जुड़े हैं। हरियाणा पंजाब में दस हजार से अधिक डेरे हैं और वहां की सत्तर फीसदी आबादी इनसे जुड़ी हुई है। गांव देहात में जैसे कभी हर जाति का मंदिर और गुरूद्वारा होता था, अब इन्ही जातियों का कोई बाबा अपना डेरा खोले बैठा है और बड़ी संख्या में लोगबाग उनसे जुड़ रहे हैं। दलित और पिछड़ी जातियों के लोग इन डेरों की असली ताकत बन कर उभरे हैं। बेशक रामपाल और राम रहीम जैसे अनेक बाबा अब बलात्कार जैसे आरोपों के चलते जेल में हों मगर उनके चाहने वालों की संख्या फिर भी कम नहीं हो रही। चलिए माना कि जातीय पहचान और उसकी एकता से हरियाणा पंजाब में ये डेरे फले फूले मगर दिल्ली की वह समृद्ध आबादी जो जातीय असुरक्षा और उससे जुड़ी हीन भावना से दूर है, वह क्यों डेरावादी हो रही है ? क्या कथित बड़े मंदिरों के आडंबरों और उनकी लूट खसोट इसका बड़ा कारण तो नहीं ?
हाल ही में काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने बाबा के दर्शन, आरती, भोग लगाने और पूजा के अन्य तरीकों के लिए रेट लिस्ट जारी की है । पूजा के दामों को देखकर बड़े बड़े आस्तिकों का विश्वास अपने मंदिरों के प्रति डिगा है। हालांकि हिन्दू धर्म के लगभग सभी बड़े मंदिरों में पहले से ही भगवान के दर्शन की फीस वसूली जाती है और वीआईपी दर्शनों के नाम पर भी अच्छे खासे पैसे लिए जाते हैं मगर काशी विश्वनाथ मंदिर ने तो जैसे सभी को पीछे छोड़ दिया है। दुनिया भर में इकलौता हिंदू धर्म है जो इष्ट के दर्शन के पैसे लेता है। मगर काशी विश्वनाथ मंदिर तो प्रधान मंत्री जी के लोकसभा क्षेत्र में आता है और उन्हीं के प्रयासों से अब उसका भव्य रूप भी विकसित हुआ है , फिर ऐसा कैसे हो हो रहा है कि भगवान की पूजा अर्चना का इतना अधिक दाम वसूला जा रहा है ? क्या इसके लिए पहले उनसे स्वीकृति ले ली गई थी ? यदि नहीं तो पंडो पुजारियों ने यह हिमाकत कैसे की ? समझ नहीं आ रहा कि हिंदुओं के हितों की बात करने वाले लोगों को यह सब दिखाई क्यों नहीं दे रहा ? वे लोग जो हिन्दुओं को एकत्र कर अपना राजनीतिक हित साधना चाहते हैं, वे अपने इन मंदिरों के संचालकों की लगाम क्यों नहीं कस रहे जिनकी हरकतों से हिंदू धर्म में नित नई फूट पड़ रही है । माना कि जातीय भेदभाव रातों रात दूर नहीं किया जा सकता मगर धार्मिक स्थलों की ठगी से ऐसा हो , इसे कैसे उचित ठहराया जा सकेगा ? धर्म के ठेकेदारों गौर से देखो तुम्हारी गठरी में चोर लग गया है।