द ताशकंद फ़ाईल्स

रवि अरोड़ा

हाल ही में द ताशकंद फ़ाईल्स फ़िल्म देखी । देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की आकस्मिक मृत्यु पर बनी इस फ़िल्म का यह एक डायलाग दिमाग़ में छप सा गया- यहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी के लिए काम कर रहा हैं और यह उसे भी नहीं पता कि वह किसके लिए काम कर रहा है । अब हो सकता है कि फ़िल्म के लेखक और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने भी किसी ख़ास को ख़ुश करने के लिए यह फ़िल्म बनाई हो । शायद यह भी हो कि चुनाव की बेला में शास्त्री जी की मृत्यु पर सवाल उठाते हुए एक ख़ास दिशा में शक की सुई ठहराते हुए शायद वे यह भी न जान पाए हों कि वे किसके लिए यह काम कर गए हैं। फ़िल्म के अंत में लिखा हुआ मिलता है कि प्रस्तुत तथ्य और प्रपत्र प्रमाणित नहीं हैं मगर फ़िल्म साफ़ तौर पर दावा करती नज़र आती है कि शास्त्री जी की हत्या हुई और सोवियत संघ की ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी ने ज़हर देकर यह हत्या की और फ़िल्म षड्यंत्र का शक उन इंदिरा गांधी पर ज़ाहिर करती है जो शास्त्री जी की मौत से सर्वाधिक लाभान्वित हुईं और देश की प्रधान मंत्री बनीं । फ़िल्म कई बार देश के वरिष्ठतम पत्रकार स्वर्गीय कुलदीप नैयर का भी ज़िक्र करती है और उनके एक इंटरव्यू को भी काट-छाँट कर इस तरह दिखाती है जिससे यह लगता है कि नैयर साहब को भी शक था कि शास्त्री जी मृत्यु स्वभाविक नहीं थी । चूँकि मझे नैयर साहब का सानिध्य प्राप्त था मैने उनके द्वारा इस विषय पर लिखी पुस्तकें पढ़ी हैं अतः मुझे लगता है कि शास्त्री जी कि मृत्यु पर न सही मगर कम से कम नैयर साहब के नाम पर परोसे गए असत्य पर तो बात कर ही सकता हूँ ।

शास्त्री जी कि मृत्यु के समय नैयर साहब शास्त्री जी के साथ ताशकंद में ही थे । अपनी पुस्तकों इंडिया आफ़्टर नेहरू और स्कूप में शास्त्री जी की मृत्यु पर उन्होंने विस्तार से लिखा है । कभी शास्त्री जी के प्रेस सचिव भी रहे नैयर साहब उन दिनो यूएनआई के लिए लिखते थे । अपनी पुस्तकों में वे लिखते हैं कि 1965 की लड़ाई में भारत ने पाकिस्तान की दो चौकियाँ हाजी पीर और तिथवाल पर क़ब्ज़ा कर लिया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री शास्त्री जी ने इन चौकियों को न छोड़ने का फ़ैसला लिया था । सोवियत रूस के प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसीगिन की पहल पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मोहम्मद अयूब अली से जनवरी 1966 में उसकी वार्ता निश्चित हुई । रूस कश्मीर मुद्दे पर भारत का प्रबल समर्थक था । तीन दिन चली वार्ता असफल ही हो चली थी । दोनो देश अपनी अपनी शर्तों पर अड़े हुए थे । बाद में कोसीगिन के समझाने पर अनमने शास्त्री जी अपने क़ब्ज़े वाली दोनो चौकियाँ छोड़ने को राज़ी हो गए । देश में यह ख़बर पहुँचते ही उनकी चहूं ओर निंदा होने लगी । उन्होंने अपने घर पर फ़ोन मिलाया और छोटे दामाद बी एन सिंह और लाड़ली बेटी कुसुम से बात की और समझौते के बाबत चर्चा की । दोनो के नाख़ुशी ज़ाहिर करने पर उन्होंने पत्नी ललिता जी से बात कराने को कहा मगर समझौते से नाराज़ ललिता जी ने उनसे बात करने से मना कर दिया । इससे शास्त्री जी बड़े व्यथित हुए । रात को उन्होंने साग, आलू और करी के साथ रोटी खाई और सोने से पहले अपने विश्वसनीय बावर्ची रामनाथ से मँगवा कर एक गिलास दूध भी पिया । हालाँकि उनकी परेशानी बनी रही और वे देर रात अपने कमरे में टहलते रहे । रात को एक बजकर बीस मिनट पर बेचैनी में उन्हे बड़ी मुश्किल एक वाक्य कहते हुए देखा गया कि डॉक्टर कहाँ है । दूसरे कमरे में सो रहे उनके निजी डॉक्टर चुग जब तक उनके पास पहुँचे उनकी मृत्यु हो चुकी थी । हालाँकि शास्त्री जी को पहले भी दिल के दो दौरे पड़ चुके थे और शव की जाँच करने वाले डोक्टरों के अनुसार उनकी मृत्यु हृदयघात के चलते मायोकार्डियक़ इनफ़ारक्शन यानि धमनियों तक रक्त न पहुँचने के कारण हुई । शास्त्री जी का शव जब भारत पहुँचा तब तक वह काला पड़ चुका था और उनके शरीर पर कई कट्स भी थे ।

यही वजह थी कि ललिता जी को उनकी मृत्यु संदेहास्पद लगी और चार वर्ष बाद उन्होंने इसकी जाँच की माँग भी की । बाद में संसद में भी कई बार यह मुद्दा उठा ।

द ताशकंद फ़ाईल्स मृत्यु से किसे लाभ हुआ जैसा सवाल उठा कर इंदिरा गांधी की ओर इशारा करती है मगर नैयर साहब अपनी पुस्तकों में लिखते हैं कि उस समय एसबी चौहाण , गुलज़ारी लाल नंदा , मोरारजी देसाई तथा इंदिरा गांधी शास्त्री जी का विकल्प बन कर उभरे थे और कांग्रेस अध्यक्ष कामराज ने इंदिरा गांधी के नाम पर मोहर लगा दी । यानि शास्त्री जी की मृत्यु का लाभ किसे होगा यह मृत्यु होने तक स्पष्ट नहीं था । बेशक शास्त्री जी कि मृत्यु को लेकर फ़िल्म कई गम्भीर सवाल उठाती है और उन मुद्दों को भी सामने लाती है जो आज तक स्पष्ट नहीं हैं मगर जल्दबाज़ी में फ़िल्म जिस नतीजे पर पहुँच रही है वह भविष्य में फ़िल्मों के माध्यम से भी बेहूदा राजनीति होने की ओर इशारा करती है । हो सकता है कि भविष्य में कांग्रेस केंद्र में लौटी तो दीन दयाल उपाध्याय की रहस्यमय मृत्यु पर भी तथ्यों से छेड़छाड़ करती कोई एसी ही फ़िल्म हमें देखने को मिले जो उपाध्याय जी की मृत्यु से लाभ का सवाल उठाते हुए स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई जी की ओर कनख़ियो से देखे ।

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