दुश्मन के मरने की खुशी के मायने
रवि अरोड़ा
पाकिस्तान की मशहूर अभिनेत्री हैं मायरा खान । शाहरूख खान की फिल्म ‘ रईस ‘ में भी उन्होंने बतौर नायिका काम किया है। हाल ही में उनकी एक पोस्ट सोशल मीडिया के लगभग हर प्लेटफॉर्म पर वायरल हो रही है ‘ हाऊ तो डेस्ट्रॉय ए कंट्री विद इन 75 इयर्स ‘ यानी किसी मुल्क को 75 सालों में कैसे बर्बाद किया जाए । इस पोस्ट में संक्षेप में उन कारणों को गिनाया गया जिससे पकिस्तान बर्बाद हुआ । मायरा खान का यह वीडियो मेरे बेटे ने मुझे भेजा जो काम के सिलसिले में कई माह दुबई में रहा और हाल ही में लौटा है। बकौल उसके पूरी दुनिया में पाकिस्तान की क्या औकात रह गई है, वह समझने के लिए अकेला दुबई ही काफी है। एयरपोर्ट पर उतरते ही इमिग्रेशन ऑफिसर पाकिस्तानी से सबसे पहले यही पूछता है कि उसके पास कम से कम पांच हजार दुबई की करेंसी दिरहम हैं कि नहीं। यदि नहीं तो पाकिस्तानी का डिपोर्ट होना लगभग तय ही होता है। जबकि इसके विपरित भारतीयों से कोई सवाल नहीं किया जाता और दो मिनट में तमाम औपचारिकताएं पूरी कर दी जाती हैं।
पूछने पर बेटे ने बताया कि हम भारतीय आधिकांशत घूमने फिरने ही वहां जाते हैं और यदि नौकरी आदि भी करें तब भी अपनी पूरी कमाई वहां खर्च कर देते हैं। इसके विपरीत पाकिस्तानी की मंशा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा घर भेजना ही होता है। भारतीयों के मुकाबले पाकिस्तानी कम पढ़े लिखे होते हैं और कमोवेश छोटे मोटे काम ही उन्हें मिलते हैं। अधिकांश बेरोजगार पाकिस्तानी ही दुबई आते हैं क्योंकि उनके पासपोर्ट की पूरी दुनिया में कद्र तली पर लगी हुई है और ले देकर दुबई जैसे चंद मुस्लिम देश ही इन्हें अपने यहां आने देते हैं। अब यह किसी से छुपा हुआ तो है नहीं कि पाकिस्तान अब पूरी तरह तबाह हो चुका है और उस पर 274 बिलियन डॉलर का कर्ज है। कर्ज अदायगी तो दूर की बात वह ब्याज भरने की स्थिति में भी नहीं है। वैसे हालात तो वहां पहले से ही खराब थे मगर पिछले साल आई बाढ़ ने उसके ताबूत में आखरी कील ही ठोक दिया । आलम यह है कि वहां लोगों को आटा तक नसीब नहीं हो रहा और उनके भूखों मरने की नौबत आ गई है। बेशक पाकिस्तान की बर्बादी में वहां के भ्रष्ट नेताओं, अति महत्वाकांक्षी फ़ौज और अकारण भारत को अपना दुश्मन मानने की नीति का बड़ा हाथ है मगर फिर भी तह में जाने पर इसका असली कारण धर्म की राजनीति ही नज़र आता है। हिन्दू-मुस्लिम की आड़ लेकर पहले भारत को दुश्मन करार दिया गया और फिर लोकतंत्र का गला घोंट कर फ़ौज ने पूरे मुल्क पर कब्जा कर लिया। अजब विडंबना है कि 75 सालों में भी वहां लोकतंत्र अपने पांव नहीं जमा सका ।
सूफी संत मियां मोहम्मद बक्श की मशहूर रचना है- दुश्मन मरे ते खुशी न करिए, ते सज्जना वी मर जाना यानि दुश्मन के मरने की खुशी नहीं करनी चाहिए क्योंकि मर तो हमारे अपने लोग भी जायेंगे। बुरा न मानें तो कहना चाहूंगा कि भारत में इन दिनों जिस तरह धर्म की राजनीति को परवान चढ़ाने की तैयारियां चल रही हैं हश्र तो इसका भी कुछ अच्छा नहीं होना है। यदि सहमत हों तो आप भी दुआ कीजिए कि भगवान हमारे इन नेताओं को सद्बुद्धि दे । कुछ और नहीं तो कम से कम ये लोग पाकिस्तान के हालात से ही कुछ सबक सीख लें।