दुबई से लौट कर

रवि अरोड़ा

हाल ही में मित्रों के साथ घूमने दुबई गया था । वहाँ दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज ख़लीफ़ा की छत पर चढ़ कर मन डारविन के सिद्धांत थ्योरी ऑफ इवोलूशन यानि क्रमविकास वाद से बग़ावत कर बैठा । मन इन सवालों के हवाले हो गया कि बंदर से विकसित हुई कोई प्रजाति भला इतनी ताक़तवर कैसे हो सकती है कि लगभग एक-एक किलोमीटर ऊँची इमारतें बना ले और मात्र एक मिनट में उसकी छत पर भी पहुँच जाए ? इंसान नाम का यह जीव इतनी क़ाबलियत कहाँ से लाया कि समंदर पाट कर उसने पाम सिटी जैसे शहर बसा लिए ? यह कैसे हुआ कि मरुस्थल अब उसकी मुट्ठी में हैं और धरती के तमाम अन्य जीव उसके ग़ुलाम ? क्रम विकासवाद सही हो सकता है मगर अब अचानक एसा क्या हुआ कि 98 फ़ीसदी चिम्पांज़ी से मिलते जुलते इस जीव के विकास की गति पिछले सौ सालों में कई सौ गुना बढ़ गई ? दिल कई शंकाओं के हवाले हो गया और डॉक्टर एलिस सिल्वर के सिद्धांत ह्यूमन एलियन हायपोथीसिस की ओर झुकता चला गया । एलिस कहते थे कि हम इंसान ही एलियन यानि परग्रहजीवी हैं और किसी और ग्रह से यहाँ आए हैं । अपने इस सिद्धांत के पक्ष में वे अनेक तर्क भी देते हैं जो ज़ेरे बहस हैं और विद्वान सिर खुजा खुजा कर उसके पक्ष और विपक्ष में तर्क देते हैं ।

डारविन का क्रमविकास वाद का सिद्धांत बचपन से ही हमें घुट्टी की तरह पढ़ाया जाता है । हालाँकि इसके पक्ष में डारविन द्वारा दिए गए तर्कों को चुनौतियाँ भी ख़ूब मिलती रही हैं मगर आज भी लगभग पूरी दुनिया इसके पक्ष में खड़ी है । निजी तौर पर मुझ जैसे कम पढ़े लिखे लोग भी इस पर विश्वास करते हैं मगर अब प्रकृति से छेड़छाड़ जिसे हम इंसानी तरक़्क़ी की जीती जागती मिसालें कहते हैं , देख कर मन डोलने लगता है । अन्य जीव करोड़ों सालों से धरती पर हैं और हमारी उम्र मात्र दो लाख साल है । अन्य जीव एक क़दम भी आगे नहीं बढ़े और हम चाँद सितारों तक पहुँच गए । अन्य सभी जीव वातावरण के हिसाब से ख़ुद को ढाल लेते हैं और हम वातावरण को ही अपने अनुरूप बनाने में कामयाब हो गए । बेशक अपनी इस अदा के चलते ही हमने धरती का पानी गंदा कर दिया , पेड़ काट डाले , हवा दूषित कर दी और धरती से खनिज निकाल लिए । यही नहीं हम अभी भी थम नहीं रहे । लगातार गर्म होती धरती भी हमें विचलित नहीं करती । धरती के अन्य सभी जीव जीवन चक्र को आगे बढ़ाने में एक दूसरे के पूरक बनते हैं मगर इस चक्र में हमारी भूमिका विध्वंस के अतिरिक्त और कुछ नहीं । आज जिस इंसानी तरक़्क़ी पर हमें गुमान है उसकी क़ीमत हमने नहीं इस धरती ने चुकाई है। डॉक्टर एलिस कहते हैं कि किसी अन्य ग्रह की विकसित प्रजाति यानि एलियन हमें यहाँ छोड़ गए और हम सदा के लिए भी यहाँ नहीं हैं । धर्मवीर भारती इस धरा को यूँ ही अधबनी नहीं कहते थे । अब यह तो हर कोई देख ही रहा है कि पूरी सृष्टि अधबनी है और उसका निर्माण लगातार जारी है । मगर मैं तो वहीं अटका हूँ कि हम जो कर रहे हैं क्या वह निर्माण ही है ? एलिस ठीक कहते हैं शायद हम किसी और ग्रह के ही हैं और यह धरती हमारी नहीं है । यदि सचमुच यह हमारा घर होती तो हमें कभी तो इसपर तरस आता । बुर्ज ख़लीफ़ा की छत पर चढ़ कर मन इंसानी तरक़्क़ी से प्रभावित तो हुआ मगर यह सवाल भी साथ हो लिया कि यह इमारत क्या ज़रूरत के लिए बनाई गई अथवा इंसानी अहम की संतुष्टि के लिए ?

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