ताली-थाली की लाज

रवि अरोड़ा
ढाई महीने से अधिक हो गये फ़ोन पर कोरोना सम्बंधी कैसेट सुनते हुए ।कहीं भी किसी को भी फ़ोन मिलाओ पहले दो मिनट यह भाषण सुनना पड़ता है कि हमें डाक्टर्स , स्वास्थ्य कर्मी, सफ़ाई कर्मचारियों एवं पुलिस का सम्मान करना है । हालाँकि पूरा मुल्क पहले भी एसा करता था और अब भी रहा है ।मगर फिर भी मोदी जी के कहने पर करोड़ों लोगों ने इनके सम्मान में ताली और थाली भी बजाई थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है । अब तो सरकार को इनसे कहना पड़ेगा कि वे भी हमारा थोड़ा बहुत सम्मान करें । देश भर के अस्पतालों से जो समाचार मिल रहे हैं वे तो यही चुग़ली कर रहे हैं कि डाक्टर्स इस महामारी को कैश करने में लगे हैं और हमारे जीने-मरने से उन्हें कोई मतलब नहीं । उधर पुलिस उत्पीड़न की भी नित नई कहानियाँ सामने आ रही हैं । पता नहीं हमारी ताली-थाली की भी लाज ये लोग क्यों नहीं रख रहे ?
दो दिन पहले दिल्ली निवासी मेरे एक परिचित का फ़ोन आया । उनका कोई अपना कोरोना से पीड़ित है । बक़ौल उनके दिल्ली के अस्पतालों में बेड पर भारी ब्लैक चल रही है और वे पचास लाख रुपये तक ख़र्च करने को तैयार हैं मगर कोई अस्पताल बेड नहीं दे रहा । हालाँकि अस्पतालों में बेड ख़ाली हैं मगर एक एक बेड की मोटी-मोटी बोलियां लग रही हैं । विधायक मंज़िंदर सिंह सिरसा तक की सिफ़ारिश वे लगवा चुके हैं मगर कोई सुनवाई नहीं हुई । उधर पिछले कई दिनो से दिल्ली के अस्पतालों के जो वीडियो सोशल मीडिया पर आ रहे वे भी साबित कर रहे हैं कि कोरोना से मुक़ाबले में दिल्ली की केजरीवाल सरकार फ़्लाप हो गई है और अस्पताल प्रशासन पर उनका कोई वश नहीं है । हालाँकि पोल खुलने पर शनिवार से सरकार कुछ सक्रिय हुई है मगर उसका असर भी केवल इतना ही हुआ है कि दिल्ली के अस्पतालों में अब बाहर के मरीज़ भर्ती नहीं किये जा रहे । ग़ाज़ियाबाद, नोयडा, फ़रीदाबाद और गुड़गाँव जैसे एनसीआर के बड़े शहरों का आधार कार्ड देखते ही डाक्टर उसे दूर फेंक रहे हैं । एनसीआर की अवधारण का इससे बड़ा उपहास भला और क्या हो सकता है ?
खोड़ा की गर्भवती महिला की मौत से बेशक अब कोहराम मच गया है मगर डाक्टरों की बेशर्मी अभी भी बरक़रार है और अब सरकारी अस्पताल वाले दावा कर रहे हैं कि हमारे यहाँ महिला को लाया ही नहीं गया । इस महिला और उसके गर्भ में पल रहे आठ माह के बच्चे की मौत तो एक उदाहरण भर है । दिन भर में एसी दर्जनों कहानियाँ सामने आ रही हैं । चूँकि इस मृतका का पति अखबारी दुनिया से ताल्लुक़ रखता था अतः हमें-आपको घटना का पता भी चल गया ।वरना आम आदमी का दर्द तो उसके सीने में ही घुट कर रह जाता है । वैसे इससे अधिक शर्मनाक और क्या होगा कि गर्भवती को आठ अस्पतालों में ले जाया गया मगर किसी ने उसे भर्ती नहीं किया । गर्भवती हथिनी की हत्या पर गमगींन हुए लोग क्या इस मौत पर भी कुछ कहेंगे ?
उधर, ख़ूब शिकायतें मिलने पर प्रदेश सरकार का स्वास्थ्य मंत्रालय आजकल सरकारी अस्पतालों की जाँच कर रहा है । हर जगह से लापरवाही की ख़बरें तो मिल ही रही हैं साथ ही यह भी स्पष्ट हो रहा है कि महामारी के दौर में भी टायलेट की सफ़ाई नहीं हो रही । श्रम क़ानूनों का एसा मकड़जाल है कि ख़ामी मिलने पर भी सफ़ाई कर्मी की बर्ख़ास्तगी तो दूर उसका तबादला भी आसानी से नहीं किया जा सकता । नतीजा तमाम जाँच और उसकी रिपोर्ट फ़ाइल तक ही सिमट रही है । मगर महामारी के चलते उद्योगों के लिए श्रम क़ानूनो में परिवर्तन का राग अलापने वाली सरकार अपने कर्मचारियों के श्रम क़ानून सम्बंधी अधिकारों को स्थगित करने के बाबत सोच भी नहीं सकती ।
लीजिए अब पुलिस की कहानी सुन लीजिये । दो दिन पूर्व सत्तर वर्षीय शहाब तारिक दोपहर बारह बजे अपनी मोपेड से कहीं जा रहे थे कि वसंत सिनेमा के निकट गर्मी की वजह से उन्हें गश आ गया और वे गिर पड़े । इत्तेफ़ाक से वहाँ पुलिस की जिप्सी और चार पाँच पुलिस वाले भी अपनी बातों में मशगूल खड़े थे । आसपास के लोग दौड़े और उन्होंने वृद्ध को उठाया मगर मजाल है कि यह सब देख कर भी पुलिस कर्मी अपनी जगह से टस से मस हुए हों । चैकिंग के नाम पर दिन भर हो रहे राहगीरों और दुकानदारों के पुलिस उत्पीड़न की चर्चा तो यहाँ बेकार ही है । यह स्थिति तो तब है जब महामारी अपने चरम से अभी बहुत दूर है । ईश्वर न करे वह दिन आ गया तब ये लोग न जाने क्या करेंगे जिनका सम्मान करने की नसीहत हमें दिन भर फ़ोन पर सुनाई जाती है ।

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