ठहरे हुए लोग

रवि अरोड़ा
पंडित जवाहर लाल नेहरू की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक डिस्कवरी आफ इंडिया पर बने श्याम बेनेगल के टेलिविज़न धारावाहिक भारत एक खोज में एक रोचक दृश्य है । छत्रपति शिवाजी के दो अनुयायी सैनिक उनके एक क़िले के बाहर तैनात हैं । बरसों से वे इस क़िले के बाहर पहरा दे रहे हैं । उन्हें कोई व्यक्ति समझाने आता है कि शिवाजी महाराज अब नहीं रहे और उनका देहांत हुए सैंकड़ों साल हो गए हैं । देश में अब मराठों का शासन भी नहीं है अतः आप लोग अपने घर जायें मगर वे लोग नहीं मानते और कहते हैं कि नहीं शिवाजी महाराज ने हमारे ख़ानदान की ड्यूटी इस क़िले की सुरक्षा के लिए लगाई थी और हम पीढ़ी दर पीढ़ी इसे निभा रहे हैं और बिना उनकी आज्ञा के वे लोग इस क़िले से एक कदम भी बाहर नहीं रख सकते । आज जब समाचार मिला कि पटियाला में कुछ निहंगों ने पुलिस पर हमला कर दिया और एक पुलिस कर्मी का धारदार हथियार से हाथ काट कर अलग कर दिया तो बरबस शिवाजी के वे दो सिपाही याद आ गए । ये निहंग भी धारावाहिक भारत एक खोज के उन मराठा सिपाहियों जैसे ही तो हैं । इतिहास के किसी काल खंड में ठहरे हुए लोग । जो आज को न तो जानते हैं और न ही मानते हैं । एसे रुके हुए, इतिहास में कहीं ठहरे हुए लोग देश में भरे पड़े हैं और अफ़सोस यह कि बावजूद इसके उन्हें समाज में सम्मान की नज़रों से देखा जाता है । यह सम्मान तब तक अडिग रहता है जब तक पटियाला अथवा मरकज़ जैसी घटना सामने नहीं आती।
दशम गुरु गोविंद सिंह जी को इस जगत से विदा हुए तीन सौ साल हो चले हैं । आज न राजशाही है और न ही सिखों और उनके ग्रंथ साहब की सुरक्षा को कोई ख़तरा है । इसके अतिरिक्त न ही किसी को अपनी सुरक्षा के लिए निजी सैनिक रखने की इजाज़त है तो फिर ये हज़ारों सिख निहंग बन कर किसकी रक्षा कर रहे हैं और क्यों ? उस दौर में गुरुओं ने जो हथियार दिए थे जो हमलावर होने की ट्रेनिंग दी थी, क्यों अभी तक अपने सीने से चिपटाए घूम रहे हैं ? चलिए चिपटाया तो चिपटाया मगर क्यों बात बात पर क़ानून हाथ में ले लेते हैं और अब हिमाक़त देखिए कि एक पुलिस कर्मी का हाथ ही काट दिया ?
भारत भी अजब देश हैं । यहाँ गतिशील लोग कम और ठहरे लोग ज़्यादा हैं । कुम्भ के मेले में पहले स्नान करने के लिए लड़ने वाले नंग धड़ंग नागा हों या युगों बाद भी वही पुरातन कर्म कांड कराने वाले पंडे-पुरोहित , सभी एक ही क़तार के ही तो लोग हैं । ताजा नाम अब तबलीगी जमात का जुड़ा है जो देश-दुनिया को चौदह सौ साल पुराने काल खंड में ले जाने में लगे हैं । पता नहीं इन्हें कोई क्यों नहीं समझाता कि कायनात में सब कुछ परिवर्तनशील है तथा बस एक चीज़ स्थाई है और वह है परिवर्तनशीलता का नियम । मगर ये लोग न जाने ख़ुद को वक़्त के अनुरूप बदलने को क्यों तैयार नहीं होते ?
चलिये माना कि लोकतंत्र है और सबको अपने धर्म और उससे जुड़ी मान्यताओं के पालन का अधिकार है मगर लखटका सवाल यह है कि फिर संविधान की क्या ज़रूरत है ? जब सबको अपने धर्म के अनुसार ही चलना है तो फिर इतनी मेहनत करके यह संविधान बनाया ही क्यों है ? बेशक किसी एक घटना को उससे जुड़े धर्म से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए । कोई अपराध व्यक्तिगत होता है और उसके कर्ता के धर्म से उसे जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिये । धर्म चाहे हिंदू हो मुस्लिम हो अथवा सिख उसके तमाम मानने वाले अपने किसी सधर्मी अपराधी के कारण कटघरे में खड़े नहीं किए जा सकते । मगर जमात अथवा निहंगों जैसी घटनाएँ होती हैं तो उस धर्म के लोगों को उस पर विचार तो करना ही चाहिए ना ।

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