ठलुओं की दुनिया

रवि अरोड़ा

किसी काम से नवयुग मार्केट गया था और अम्बेडकर पार्क के पास से गुज़रना हुआ । देखता क्या हूँ कि पार्क में सौ से अधिक लोग यूँ ही पसरे पड़े हैं । अधिकांश धूप में सो रहे हैं तो कई बैठे बतिया रहे हैं । बूढ़ों का एक समूह कोने में ताश पीट रहा है । हालाँकि उस दिन रविवार अथवा अवकाश का भी कोई दिन नहीं था और न ही लंच टाइम , फिर इन लोगों को इतनी फ़ुर्सत कैसे मिल गई जो यूँ पसरे हुए हैं ? अब ग़ालिब का ज़माना तो है नहीं जो कहें कि जी ढूँढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन , बैठे रहें तसव्वुर ए जाँना किए हुए । यूँ भी ये तमाम लोग आशिक़ मिज़ाज लगे भी नहीं जो अपने महबूब की याद में यूँ बेख़ुद हो रहे हों । फिर कौन हैं ये लोग जो इस तरह ख़ाली बैठे अपना समय जाया कर रहे हैं ? इस पार्क, अन्य पार्कों अथवा अपने पूरे शहर की ही क्या बात करूँ , अन्य शहरों और गाँवों में भी तो यही मंज़र दिखाई पड़ता है । लोग बाग़ यूँ ही सुस्ताते मिलते हैं । बैठकों , चौपालों और सार्वजनिक स्थानों पर आराम तलबी का एक सा ही माहौल दिखाई पड़ता है । कई बार तो यह मंज़र देख कर लगता है कि जैसे पूरा मुल्क ही ठलुआ है । हालाँकि मन तो निकम्मा शब्द इस्तेमाल करने का था मगर कोई निकम्मा बुरा न मान जाए इस लिए ठलुआ कह रहा हूँ । चलिए आप अपनी सुविधा के लिए वेल्ला कह लीजिए , क्या फ़र्क़ पड़ता है ।

बचपन में एक क़िस्सा सुना था । सिकंदर जब भारत आया तो उसने एक आदमी को पेड़ के नीचे पसरे देखा । उसने आदमी को फटकारा और कुछ काम-धाम करने को कहा । आदमी ने पूछा उससे क्या होगा ? सिकंदर कड़ी दर कड़ी बताता रहा कि काम-धाम से पहले ये फिर और वो बाद में वो तथा आख़िर में तेरे पास सब कुछ होगा । आदमी ने पूछा उसके बाद क्या होगा ? सिकंदर ने जवाब दिया कि फिर तुम आराम करना । आदमी बोला तो आपको क्या लगता है कि पेड़ के नीचे मैं अब क्या कर रहा हूँ ? ज़ाहिर है आदमी के इस जवाब से सिकंदर निरुत्तर हो गया होगा । लगता है कि उस आदमी का वह जवाब हमारी पूरी क़ौम की आत्मा में रचा बसा हुआ है । हमारी संस्कृति , इतिहास , अध्यात्म और पूरा दर्शन इसी आराम तलबी का शिकार है । इसी आराम तलबी के पक्ष में हमने तमाम तर्क गढ़े हुए हैं । मोह माया , सांसारिक पचड़े और भोग विलास जैसे अनेक शब्दों का आवरण हमने अपनी हरामखोरी पर चढ़ा लिया है । कर्म की महत्ता यदि कहीं दिखती भी है तो उसे निस्वार्थ और फल की इच्छा के रहित रखने का उपदेश है । गोया फल का उपभोग जैसे कोई पाप हो। अब आप ही बताइए एसे में कर्म का महत्व कोई समाज समझे भी तो कैसे ?

गाँव देहात में एसे लोगों का बड़ा दबदबा रहता है जो कोर्ट कचहरी के माहिर होते हैं । यूँ भी आजकल हर गाँव में कम से कम दो तीन गुट तो होते ही हैं जिन्होंने एक दूसरे पर मुक़दमे कर रखे होते हैं । शहरों की गलियों और मोहल्लों में भी एसे मुक़दमेबाज़ लोगों की बड़ी धाक होती है । दरअसल ख़ाली दिमाग़ शैतान का घर वाली कहावत ही इन लोगों पर लागू होती है । अब और कुछ नहीं तो झूठी शिकायतें और फ़र्ज़ी मुक़दमे ही सही । घरों में भी सास-बहू , ननद-भाभी और भाई-भाई के झगड़ों में ख़ाली दिमाग़ की भूमिका ख़ासी रहती है । जैसे जैसे महिलायें काम काज के सिलसिले घरों से बाहर निकालने लगी हैं , ये पचड़े भी कुछ कम हुए हैं । बूढ़ी सास मंदिर और कथाओं में जाने के बहाने अपना समय काटती दिखती हैं तो पेंशनर बूढ़े पार्कों अथवा चौपालों पर गपशप में समय व्यतीत करते हैं । गोया टाइम पास करना हमारे समाज का ख़ास शग़ल हो । कोई हाल चाल पूछे तब भी हम बड़े संतोष से उत्तर देते हैं-टाइम पास हो रहा बस । नौकरी से रिटायर होते ही जैसे हमें फिर कोई काम न करने का लाइसेंस मिल जाता है । अब तो वीआरएस का ज़माना है और फ़ुर्सत के लिए लोगबाग़ साठ साल का होने का भी इंतज़ार नहीं करते । जिसे देखो वही वेल्ला, ठलुआ और फ़ुर्सत में हैं । अब आप मुझे भी ठलुआ कह सकते हैं जो ख़ाली बैठा आयें बायें सोचता रहता है । कह लीजिए, कह लीजिए । आप भी वेल्ले हैं जो यह सब पढ़ रहे हैं ।

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