ठरक के नाम पर

रवि अरोड़ा
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनावों में हुई भाजपा की प्रचंड जीत पर चर्चा के लिए हाल ही में एक चैनल पर मैं भी आमंत्रित था । हालांकि मैंने कोई गैरसंवैधानिक बात नहीं कही थी मगर पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि एक नेता जी प्रवक्ता भड़क गए । पैनल में भक्त किस्म के एक राजनीतिक विश्लेषक भी थे और वे भी पाला खींच कर बैठ गए । मेरा कसूर इतना सा था कि मैं यह मानने को तैयार नहीं था कि विधान परिषद की जीत का किसी पार्टी के जनाधार बढ़ने घटने से कोई ताल्लुक है । मेरा पक्ष यह था कि विधान परिषद का चुनाव सत्ताबल, बाहुबल और धनबल का चुनाव होता है और जिसकी सरकार होती है , हर सूरत जीतता ही है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है । यह चर्चा इतनी गर्मागर्म थी कि मुझे लगा बात को और आगे बढ़ाना चाहिए और ताज़ा तरीन राजनीतिक बहसों में इस मुद्दे को भी शामिल कराने की कोशिश करनी चाहिए ।

हाल ही में संपन्न हुए इस चुनावों में भाजपा को 36 में से 33 सीटें हासिल हुईं । सौ सीटों वाली विधान परिषद में अब भाजपा का बहुमत हो गया है । ऐसा 42 वर्ष के बाद हुआ है कि किसी पार्टी का विधान परिषद में बहुमत हो । अब इसी बहुमत को लेकर तमाम दावे किए जा रहे हैं मगर उसके तथ्यों पर चर्चा कोई नहीं कर रहा । एमएलसी के छः साल के कार्यकाल के लिए दो दो साल बाद तीन किश्तों में चुनाव होते हैं । अब ऐसे में लगातार दो बार सरकार बनाने वाली किसी भी पार्टी को बहुमत मिलना सामान्य सा गणित है और प्रदेश में चूंकि योगी सरकार पुनः सत्ता में आई है अतः भाजपा का विधान परिषद में भी बहुमत हो गया ।

वैसे यह समझना भी कोई राकेट साइंस नहीं है कि मात्र एक महीने पहले जिस समाजवादी पार्टी को प्रदेश भर से 32 फीसदी वोट मिले थे उसे परिषद के चुनाव में एक भी सीट क्यों नहीं मिली ? बसपा को भी विधानसभा चुनावों में 12 फीसदी वोट पड़े थे मगर उसकी झोली भी इस बार खाली रही । दरअसल सब जानते हैं कि इन चुनावों में सत्ता की भूमिका कितनी होती है । साल 2004 में सपा की जब सरकार थी उसे 36 में से 24 सीटें मिली थीं और उसके भी थोक के भाव प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए थे जबकि बसपा का खाता भी नहीं खुला था । मगर 2010 में जब बसपा की सरकार थी तो उसे 36 में से 34 सीटें मिल गईं और सपा की झोली खाली हो गई । निर्विरोध जीतने वालों की संख्या इस बार और बढ़ गई मगर 2016 में जब सपा की सरकार दोबारा आई तो उसने 36 में 31 सदस्य अपने चुनवा लिए । दुनिया जानती है कि विरोधी प्रत्याशियों को प्रशासन के बल पर घर बैठाने का खेल हर बार होता है और इसी के बल पर अपना प्रत्याशी निर्विरोध चुनवा लिया जाता है ।

समझ नहीं आता कि जब विधान परिषद के पास कोई विशेष अधिकार ही नहीं है, किसी बिल को वह रोक नहीं सकता तो क्यों जनता कि गाढ़ी कमाई उस पर खर्च की जा रही है ? हर माह वेतन और भत्ते आदि मिला कर एक एक एमएलसी पर सालाना पचास लाख रुपए से अधिक खर्च होता है । विधायक निधि के नाम पर वे कहां कितना पैसा खर्च करेंगे , इसका भी कोई हिसाब किताब नहीं । उनका कार्यकाल समाप्त होने पर पेंशन और तमाम अन्य सुविधाएं अलग से देय होती हैं । वैसे सवाल तो यह भी बनता है कि विधान परिषद यदि इतनी ही महत्वपूर्ण है तो देश भर में यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक के अतिरिक्त अन्य राज्यों में यह क्यों नहीं है ? विद्वान भी मानते हैं कि विधान परिषद बिना दांत के किसी जीव जैसा है और चबा नहीं सकता , उसे केवल निगलना होता है । यह भी सर्वमान्य है कि यह अब अपने गठन की मूल भावना यानि हाऊस ऑफ एल्डर्स की भावना से विमुख हो चुका है । तमाम दल इस ऊंचे सदन में अपने वफादार कार्यकर्ताओं को ही एडजेस्ट करते हैं और कई दलों ने तो इसके टिकिट बेच पर पैसा कमाने का धंधा भी इसे बना लिया है । अब बताइए कि उत्तर प्रदेश जैसे गरीब प्रदेश में कुछ लोगों की नेतागिरी की ठरक पूरी करने के लिए इतनी बड़ी फजूलखर्ची करनी चाहिए क्या ?

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