ठंड रख ले

रवि अरोड़ा

कल की बात है । किसी काम से मैं हापुड़ की तरफ़ जा रहा था । कार की स्पीड साठ के आस पास रही होगी । अचानक एक मोटर साइकिल बेहद निकट आ गई । मोटर साइकिल पर एक पति पत्नी और उनके दो बच्चे थे । छोटा बच्चा माँ की गोद में था जबकि बड़ा आगे तेल की टंकी के निकट बैठा था । हालाँकि मोटरसाइकिल सुरक्षित दूरी पर थी मगर फिर भी आगे बैठे लगभग सात-आठ वर्षीय बालक ने मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरा और ग़ुस्से से बोला-उरे दीक्खे ना है । छोटे से बालक के यह तेवर देख कर मैं हैरान रह गया । आख़िर इतना छोटा सा बालक यह शब्दावली सीखा कहाँ से ? किसने उसे बताया कि सड़क पर चलते हुए अन्य वाहन चालकों के प्रति आवेशात्मक नज़रिया ही रखना चाहिए ? उसने कैसे मान लिया कि सामने वाले से पहले दुर्व्यवहार करना आपकी सुरक्षा की गारंटी होता है ? अपशब्द आपको बहादुर और दूसरों को अपने सामने कुछ ना समझने का आपका एलान होते हैं ? हालाँकि पिता हेलमेट पहने हुए था अतः उसके हावभाव मैं देख नहीं पाया मगर ज़ाहिर है कि बालक ने बहुत कुछ अपने पिता से ही सीखा होगा । हाँ बचा खुचा ज़रूर हमने आपने उसे सिखाया होगा । यही तो कर रहे हैं हम । सड़कों पर होती रोडरेज की घटनाओं से यही तो सीख और सिखा रहे हैं हम लोग । जो पहले आपे से बाहर हुआ, उसकी विजय होगी । जो सभ्य दिखेगा वह अवश्य अपमानित होगा । मुँह में हथियार लेकर ही तो चलते हैं हम सब । मौक़ा मिलते ही सामने वाले पर तान देते हैं । अन्य इलाक़ों का तो पता नहीं मगर अपने एनसीआर का तो यही सत्य है । रोडरेज की ख़बरें रोज़ अख़बारों में लिपट कर हमारे घरों तक पहुँचती हैं और उन्हें पढ़ कर शुक्र मनाते हैं कि चलो हम नहीं थे ।

कई साल पहले मालीवाड़ा में भी कुछ इसी तरह की घटना से दो चार हुआ था । लापरवाही से स्कूटी चलाता एक बालक मेरी कार के नीचे आते बचा । इससे पहले कि मैं कुछ कहता वह बालक बोला-अबे थम जा , कटे कदी । हावभाव व कपड़ों से स्पष्ट था कि बालक निकट के ही मोहल्ले के किसी वैश्य व्यापारी का पुत्र है मगर उसने जानबूझकर एसी बोली का इस्तेमाल किया जिससे यह संदेश जाए कि वह गाँव की किसी मज़बूत जाति से ताल्लुक़ रखता है । बालक अच्छी तरह जानता था कि ग़लती उसकी है मगर वह यह भी भलीभाँति समझे हुए था कि अपनी असली पहचान उसे किसी ख़तरे में डाल सकती है । यही कारण रहा कि उसने नक़ली शिनाख्त से लबरेज़ दबंगई का सहारा लिया ।

आख़िर एसा क्यों है कि हम लोग सड़कों पर चलते हुए दबंगई को ही विनिंग फ़ोर्मूला मान लेते हैं ? क्या कारण हैं जो हमें अपनी ग़लती स्वीकार करने से रोकते हैं ? हम क्यों मान लेते हैं कि ग़लती स्वीकार करने पर हम ख़तरे में पड़ जाएँगे ? आख़िर क्यों सुलह सफ़ाई की बात सोचना हमें बचकाना लगता है और सॉरी बोलने की बजाय हम दो-दो हाथ को तैयार हो जाते हैं ? हद तो यह है कि विपक्षी के साथ यदि कोई महिला है तो अपनी दबंगई दिखाना हमें बेहद ज़रूरी ही लगने लगता है । मैं एसे कई लोगों को जानता हूँ जो सड़क पर दूसरों को सबक़ सिखाने को गाड़ी में हाकी अथवा कोई डंडा रखते हैं । कई तो बक़ायदा पिस्तौल ही गेयरबॉक्स के पास रखते हैं । सड़क दुर्घटना का मामला देख कर आगे बढ़ जाने वाले लोग रोडरेज से जुड़े मनोरंजन के ये मौक़े हाथ से जाने नहीं देते । कोई नहीं चाहता कि जल्द सुलह हो और आग में घी ही डालते रहते हैं । कुल जमा बात यह है कि रोडरेज के तमाम मसले इसी मनोभावों में लिपटे नज़र आते हैं कि हम हिंसा में अपनी सुरक्षा ढूँढते हैं । पता नहीं आपके साथ एसा कभी हुआ कि नहीं । और यदि हुआ तो आपने अपनी प्रतिक्रिया कैसे दी ? उम्मीद है आपने तो पलट कर सामने वाले से यह नहीं कहा होगा-अबे ठंड रख ले ।

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