ट्रोलिए

रवि अरोड़ा

ट्रोलिए जैसे बेढब शब्द के किए मुआफ़ी चाहता हूँ । अब क्या करूँ ट्रोल गैंग के लिए कोई सटीक शब्द हिंदी में है भी तो नहीं । पिछले कुछ सालों में इनकी संख्या जितनी तेज़ी से बढ़ी है , उतनी तेज़ी से तो शायद तारों में बिजली भी नहीं दौड़ती होगी । इर्दगिर्द का हर चौथा आदमी ट्रोलिया है । भला सा जान पड़ता आदमी मोबाइल हाथ में आते ही कितना ख़तरनाक ट्रोलिया हो जाता है , यह आप जान भी नहीं पाते। हिमाक़त देखिए कि जिसके पूरे ख़ानदान में शायद कभी किसी ने सिपाही से भी बात नहीं की हो मगर सोशल मीडिया वह बड़े बड़े नेताओं, अफ़सरों और प्रतिष्ठित लोगों की माँ-बहन एक कर देता है । इतिहास किस चिड़िया का नाम है , जिन्हें यह भी नहीं पता वे भी वट्सएप और फ़ेसबुक पर सड़कछाप शब्दों में बताने लगेंगे कि देश का बेड़ा ग़र्क नेहरू ने किया अथवा बँटवारे के समय माउंटबेटन और जिन्ना की क्या क्या बातें हुईं थीं । या फिर मुस्लिम शासकों ने जनता पर कितने ज़ुल्म किए अथवा हिंदुओं का शासन कौन कौन से देश तक फैला था , वग़ैरह वैगरह ।

दिन भर वट्सएप , फ़ेसबुक और ट्विटर पर ज़हर उगलने वाले ये लोग कोमल हृदय लोगों को धिक्कारते हैं और स्वयं को ना केवल सच्चा देश भक्त मानते हैं अपितु अपनी हरकतों को देशसेवा मान कर गौरवान्वित भी महसूस करते हैं। सेकुलर होना इनकी नज़र में पाप से कम नहीं । अब इनकी विचारधारा ( पता नहीं कोई है भी कि नहीं ) के ख़िलाफ़ किसी ने एक शब्द भी कहा तो यह लोग चढ़ दौड़ते हैं और तब तक लानत-मलानत करते हैं जब तक कि सामने वाला संचार के इस ख़ूबसूरत माध्यम से तौबा न कर ले । इनका दुस्साहस अब इतना बढ़ा है कि देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भी गरिया रहे हैं और कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी को बलात्कार की धमकी दे रहे हैं । ट्रोलियों का एसा आतंक है कि ये दोनो नेत्रियाँ इन छिछोरों से अकेले जूझ रही हैं और उनकी पार्टी के छोटे-बड़े नेता मुँह में दही जमा कर बैठे हैं ।

घर पर ख़ाली बैठा आज मैं हिसाब लगा रहा हूँ कि देश में जगह जगह लोगों के भीड़ में तब्दील होने और किसी को भी गौ हत्या अथवा बच्चा चोरी जैसे आरोपों के शक में मार देने का क्या इन ट्रोलियों से कोई सम्बंध है ? क्या कहीं एसा तो नहीं कि सोशल मीडिया पर दिन भर कथित विद्वान हमें जो ज़हर पिलाते हैं , वही हमें भीड़ होने पर उकसाता है ? इन स्वयंभू विद्वानों द्वारा पिलाया गया ज़हर आख़िर कहीं तो दिमाग़ में जाता ही होगा , कभी तो रगों में फैलता होगा ? क्रिया की आख़िर कोई तो प्रतिक्रिया होती होगी ? आख़िर क्या है उनका यह समाज शास्त्र जो झूठे इतिहासबोध से बाहर आने को तैयार ही नहीं । लौट लौट जाते हैं बाबर और औरंगज़ेब पर । आज की कोई बात नहीं , वर्तमान के मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं ? ट्रोलियों को क्या कहें , उनके आदर्श पुरुष नरेंद्र मोदी जी भी तो मनघड़ंत इतिहास बाँचते हैं । कभी बाबा बाबा नानक , कबीर और गोरखनाथ को एक साथ बैठा देते हैं तो कभी कहते हैं सिकंदर को बिहारियों ने गंगा किनारे हराया । यही नहीं जोश में आकर तक्षशिला को भी वे बिहार में ले आते हैं । भक्तों के लिए भी उनके मुँह से जो निकले वही इतिहास है और असल इतिहास जाए भाड़ में ।

ट्रोलियों की दुनिया का दायरा बेहद महीन है । हर बात पर हिंदू-मुस्लिम , हर बात पर नेहरू और इंदरा । आख़िर कोई इनसे पूछता क्यों नहीं कि ग़लतियाँ बाबर ने कीं पर जुम्मन का घर क्यूँ जले ? कहीं एसा तो नहीं कि इन्हें बाबर से कोई लेना देना ही ना हो और इनकी असल खार तो जुम्मन से ही हो ? पता नहीं जुम्मन पर भी ये रुकेंगे या फिर जमना दास तक जाएँगे ।

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