जीवित बनाम मृत देवता

रवि अरोड़ा

पॉश कॉलोनी राज नगर में मेरे एक परिचित शिव दत्त त्यागी जी का भी घर है । यह शहर की सबसे महँगी कालोनी है और वहाँ एक लाख रुपये गज़ से कम दाम न होगा । इतनी महँगी ज़मीन पर त्यागी जी के घर के बाहर से गुज़रते हुए एक छोटा सा चबूतरा मुझे अक्सर हैरान सा करता था । मूलतः पड़ौस के एक गाँव के निवासी त्यागी जी एक दिन अपने घर के बाहर मूढ़ा डाल कर बैठे दिखाई दिए तो मैंने उस चबूतरे के बाबत पूछ ही डाला । अब त्यागी जी का जवाब और भी हैरान करने वाला था । उन्होंने बताया कि ये देवता हैं जो मेरे परिवार और मेरे घर की रक्षा करते हैं । देवता कौन से ? यह पूछने पर उन्होंने बताया कि उनके सभी पूर्वज जो अब पितर बन गए हैं , वही देवता हैं । बक़ौल उनके यह उनका नियम है कि घर से बाहर जाते अथवा वापिस लौटते ही वे इस चबूतरे को प्रणाम करते हैं और तीज त्यौहार अथवा किसी ख़ुशी के अवसर पर विधि विधान से इस देवता की पूजा करते हैं । शहरी संस्कृति में पले बढ़े मेरे जैसे लोगों के लिए यह बेशक सब कुछ अनोखा हो मगर ग्रामीण संस्कृति से जुड़े लोगों के लिए तो यह सामन्य सा ही है । गाँव-देहात में घर नहीं खेतों में भी किसान अपने अपने देवता का स्थान बनाते हैं और दिन-त्यौहार उसकी पूजा करते हैं । किसी के देवता दस गज़ में विराजे हैं तो किसी के सौ गज़ में । मगर आज जब गाँव के गाँव शहरों ने निगल लिए और ज़मीनें एकड़ों नहीं फ़ुटों में नापी जा रही हैं वहाँ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अब भी कोई अपने देवताओं के लिए बेशक़ीमती ज़मीन छोड़े तो हैरानी होती ही है ।

कर्म काण्ड के जानकार मेरे मित्र बताते हैं कि पितृ हमारे हिन्दू धर्म और संस्कृति के अभिन्न अंग हैं । शास्त्रों में हमें तीन तरह के ऋण से बँधा बताया गया है । पहला है देव ऋण , दूसरा ऋषि ऋण और तीसरा मातृ-पितृ ऋण । स्वर्ग सिधारे माता-पिता और तमाम पूर्वज ही हमारे पितृ हैं । कहते हैं कि चंद्रमा से ऊपर एक पितृ लोक भी है । गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि पितरों की पूजा विष्णु की ही पूजा है । गरूण पुराण में भी पितरों की महिमा का बखान है । ज्योतिषी जन्मकुंडली में बाधा पर पितरों की नाराज़गी अथवा पितृ दोष बताते हैं । शायद यही कारण है कि पितरों की हम देवताओं की तरह पूजा करते हैं । पितृ रूष्ट हो जायें तो हमारा अनिष्ट हो सकता है अतः उस अनिष्ट से बचने को हम साल में कुछ ख़ास दिन उनके लिए ही रख छोड़ते हैं और पूरे विधि विधान से उनका श्राद्ध करते हैं । शास्त्रों के अतिरिक्त हमारे तमाम पुराणों , कथाओं और रामायण, महाभारत जैसी अन्य धार्मिक पुस्तकों में भी माता-पिता का देवताओं सरीखा सम्मान नज़र आता है ।

अब आप पूछ सकते हैं कि आज मैंने यह पितर-पितर क्या लगा रखा है ? गाँवों और खेत-खलिहानों में देवताओं के स्थान पर चर्चा का मेरा मंतव्य क्या है ? आख़िर शास्त्रों और रीति-रिवाजों का मैं बेवक्त ज़िक्र क्यों कर रहा हूँ ? जी दरअसल आपकी इन तमाम शंकाओं के प्रतिउत्तर में मैं तो बस अख़बारों की कुछ कटिंग आपके समक्ष रखना चाहता हूँ । कुछ कटिंग ही क्यों आप किसी भी दिन का कोई भी अख़बार उठा कर देख लीजिए आपको एक न एक एसी ख़बर ज़रूर मिल जाएगी जिसमें पुत्र अथवा पुत्री द्वारा सम्पत्ति के लिए माँ अथवा बाप अथवा दोनो की हत्या का ज़िक्र हो । ज़रा ज़रा सी बात अथवा बित्ति भर की सम्पत्ति के लिए बूढ़े माँ बाप की हत्याओं के समाचार अब छोटे-बड़े तमाम शहरों से आ रहे हैं । ख़ास बात यह है कि एसी ख़बरें अब हमें चौंकाती भी नहीं हैं और न ही समाज में इनकी कहीं कोई चर्चा भी होती है । अब आप ही बताइये कि जिस धर्म अथवा समाज में मरे हुए पूर्वजों की भी पूजा का विधान हो । जहाँ अनाम पूर्वज भी देवता माने जाते हों । जहाँ एसे पूर्वज जिनके नाम तक हमें नहीं पता, उन्हें प्रसन्न करने के लिए भी यज्ञ और अन्य क्रिया कलाप हों , वहाँ जीवित और साक्षात देवताओं की यूँ निर्मम हत्याएँ हो रही हों तो क्या ठहर कर सोचना नही पड़ेगा ? विचार करना नही पड़ेगा कि क्या हम अपने मूल्य खो चुके हैं या वाक़ई हम हैं ही एसे और यह तमाम कर्मकाण्ड हमारे पाखंड के सिवा कुछ नहीं ?

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