चौली की जाली

रवि अरोड़ा

इस तस्वीर में जो जगह आप देख रहे हैं वह है चौली की जाली । नैनीताल से 51 किलोमीटर दूर मुक्तेश्वर में साढ़े सात हज़ार फ़िट की ऊँचाई पर यह जगह है । कमाऊँ की इस पहाड़ी की कहानी बाद में , पहले मेरे बचपन का एक क़िस्सा सुन लीजिये । उन दिनो मैं कोई पाँच-छः साल का रहा हूँगा जब मुझे किसी कुत्ते ने काट लिया । छोटे बच्चे के पेट में ग्यारह बड़े बड़े इंजेक्शन ( उन दिनो रेबीज से बचाव का यही तरीक़ा था ) लगेंगे , यह सोच कर मेरी माँ डर गईं और उन्होंने मुझे डॉक्टर को नहीं दिखाया । कुछ दिनो बाद किसी पड़ोसन से मशवरा दिया कि भूड़ भारत नगर में एक साइकिल मरम्मत करने वाला है और वह कुत्ते के काटे का इलाज करता है , बेटे को उसके पास ले जाओ । बहरहाल मुझे उस पंचर लगाने वाले के पास ले जाया गया और उसने अपने बक्से से कुछ मिट्टी निकाल कर मेरे घाव पर मली और फिर किसी तिगडम से उन मिट्टी से एक भूरा बाल निकाला और बताया कि कुत्ते का बाल चोट में रह गया था और उसके निकल जाने से अब ज़ख़्म और बच्चा दोनो ठीक हो जाएँगे । अब आप ख़ुद हिसाब लगाइए कि कुत्ते के दाँत में कौन सा बाल रहा होगा जो पंद्रह-बीस दिन तक घाव में पड़ा रहा और उसके निकल जाने से मैं कैसे मैं ठीक हो गया हुआ हूँगा । ख़ैर अब चौली की जाली की बात ।

मुक्तेश्वर मंदिर के पास ऊँची पहाड़ी पर एक चट्टान बीच से छिदी हुई है । मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन कोई बाँझ महिला यदि इस छेद में से निकल जाये तो उसे संतान की प्राप्ति हो जाती है । ज़ाहिर है हमारे देश में एसी बातों पर विश्वास करने वालों की कोई कमी तो है नहीं सो इस ख़ास दिन यहाँ मेला सा लग जाता है और प्रशासन को बक़ायदा पुलिस का प्रबंध करना पड़ता है । दबी ज़ुबान में लोग बताते हैं इस सुराख़ को पार करते समय कई महिलाएँ खाई में गिर कर मर जाती हैं और कई बुरी तरह घायल भी हो जाती हैं मगर संतान सुख की चाह फिर भी उन्हें इस मौत के कुँए में धकेल ही देती है । उधर, जन भावना के बोझ तले दबा प्रशासन इस ख़ूनी परम्परा पर कभी रोक भी नहीं लगा पाता । हाल ही में जब मुक्तेश्वर गया तो चौली की जाली के नीचे तस्वीर खिंचवाते समय मन में सवाल उठा कि इस सुराख़ में से महिलाओं को ही क्यों निकाला जाता है उनके पतियों को क्यों नहीं ? क्या संतान की चाह केवल महिलाओं को ही होती है ? मेरे ख़याल से यदि पुरुष इस सुराख़ से निकलें तो शायद कूद फाँद कर बच भी जायें , फिर कोमलाँगनी महिलाओं पर ही यह ज़ुल्म क्यों ? एक सवाल मन में यह भी आया कि दिल्ली मुंबई जैसे शहरों में इस क़िस्म की परम्पराएँ और मान्यताएँ क्यों नहीं जन्मतीं ? अब आप कहेंगे कि जब बड़े शहरों में डाक्टरी इलाज की तमाम सुविधाएँ हैं और जगह जगह फ़र्टिलिटी क्लीनिक खुले हुए हैं तो यहाँ एसी ऊल जलूल परम्पराओं के जाल में कोई क्यों फँसेगा ? आपने बिलकुल ठीक कहा । इलाज सुलभ न होने के कारण ही चौली की जाली जैसी दक़ियानूसी मान्यताएँ जन्मती हैं । इन्हीं के अभाव और अशिक्षा के चलते संतान प्राप्ति के लिए मंत्र , व्रत , लाल किताब , ख़ास पूजा , टोटकों और नीम हकीमों की पौ बारह रहती है ।

फिर पुरानी बात पर लौटता हूँ । क्या मेरी माँ मुझसे प्यार नहीं करती थीं जो कुत्ते के काटने पर भी मेरा इलाज नहीं कराया ? ज़ाहिर है एसा कदापि नहीं था मगर उस दौर में अपनी शिक्षा , उसी से जन्मे विवेक एवं भय और अपने समाज के दिशा निर्देश के अनुरूप उन्होंने जो किया वह उचित ही रहा होगा । हालाँकि आज मैं उस स्थिति का उपहास कर रहा हूँ । मैं जानता हूँ कि आपको भी वह स्थिति हास्यास्पद लग रही होगी और लगनी भी चाहिये । दुआ कीजिये कि चौली की जाली के आशीर्वाद से जन्मी संताने भी अपनी जन्म से जुड़ी उस घटना का उपहास करें , जिसने उनकी माँ को मौत के मुँह में धकेला था । यह भी कामना कीजिए कि इसी क्रूर मान्यता से जन्मे बच्चों को भी यदि संतानोत्पत्ति में कोई दिक्कत हो तो वे किसी डॉक्टर के पास जायें न कि चौली की जाली पहुँचे । जहाँ तक मेरा सवाल है तो दुर्भाग्य से मेरे किसी अपने को कुत्ते ने काटा तो मैं भी उस पंचर वाले को नहीं ढूँढने निकलूँगा । विकास की तमाम दलीलों के बीच हमें अपने मानसिक विकास की ओर भी तो कुछ आगे बढ़ना पड़ेगा ।

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