चौथा पायदान

रवि अरोड़ा

कई बार यह अपना सौभाग्य लगता है कि हिंदुस्तान में पैदा होने के बावजूद मैं हिंदू , अगड़ी जाति और पुरुष के रूप में जन्मा । दरअसल स्त्री , अल्पसंख्यक और दलित होने का ख़तरा व दर्द आए दिन बढ़ रहा हो कोई भी मेरे जैसा ही सोचेगा । बात केवल दलितों तक ही महदूद रख़ूं तो बचपन से लेकर आजतक बहुत कुछ है जो भूलता नहीं है । नानी के घर के शुष्क शौचालय का मैला सिर पर ढो कर ले जाने वाली महिला , दादी के घर के आँगन के कोने में रखा सफ़ाई कर्मी का प्याला , माँ द्वारा बची हुई कड़क सूखी रोटियों देने पर भी उन्हें सहर्ष स्वीकार करने वाला बूढ़ा मेहतर , कपड़े धोने वाले के लड़के के साथ ना खेलने की घर वालों की हिदायत तथा अख़बारों में छाई रहने वाली आजकल की तमाम ख़बरें । कहीं दलितों को नंगा कर पीटे जाने का समाचार है तो कहीं शरीर पर एससी लिखने की सूचना है । मुल्क में प्रतिदिन छः दलित महिलाओं से बलात्कार और हर पंद्रह मिनट में एक दलित पर अत्याचार का आँकड़ा तो सरकारी खातों का ही है । आए दिन दलितों के घर भोजन करने के पाखंड के बावजूद सरकार भी मान रही है कि पिछले दस सालों में दलितों पर अत्याचार के मामलों में 66 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है । प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के गुजरात ने इस मामले में सबको पीछे छोड़ दिया है । वैसे अक्सर हमें लगता है कि दलितों की हालात में सुधार हुआ है । शायद कुछ हुआ भी है । इसमें तो कोई दो राय ही नहीं कि आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों में जातियाँ टूट भी रही हैं मगर क्या इसकी गति संतोषजनक है ? क्या हमारे तमाम चोंचले दलितों को संतुष्ट कर पा रहे हैं ? क्या यह सत्य नहीं कि समाज आज भी उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दे रहा और राजनीतिक दलों के लिए वे एक वोट बैंक के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ? शायद यही वजह तो है कि दलित वर्ग बड़ी तेज़ी से बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित हो रहा है । इससे बावजूद स्वयं को हिंदू धर्म के झंडाबरदार कहने वालों के कान पर अभी भी जूँ नहीं रेंग रही ।

आँकड़े बताते हैं कि देश में लगभग अस्सी लाख लोग बौद्ध हैं और इनमे से अधिकांश वे हैं उन्होंने कुछ समय पूर्व ही हिंदू धर्म त्यागा है । आँकड़े ही चुग़ली कर रहे हैं कि बौद्ध बनने के बाद उनकी आर्थिक , शैक्षिक , सामाजिक और राजनैतिक स्थिति में आश्चर्यजनक रूप से सुधार हुआ है । बौद्ध धर्म से दलितों के लगाव को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि इस मुल्क में महात्मा बुद्ध पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ईसा से छः सौ साल पहले ही दलितों को बराबरी का दर्जा देने की वकालत की थी। हालाँकि बुद्ध की शिक्षा हमारे समाज के काम नहीं आई और दलित आज भी चौथा पायदान ही कहलाता है । संत कबीर , ज्योतिबा फुले , पेरियार , रविदास व बाबा गाडगे जैसों ने हमें बहुत समझाया मगर हम नहीं माने । अम्बेडकर दलितों को अधिकार देने की बात करते करते निराश दुनिया से चले गए । जनजीवन राम जैसे सत्ता की भागीदारी पाकर भी ख़ाली हाथ रहे । काशीराम ख़ुद सत्ता बनने का सपना लिए ही फ़ना हो गए और अब मायावती सत्तानशीं होकर भी दलितों को निराश कर जाती हैं। आजकल रोज़ नया दलित नेता देश में पैदा हो रहा है मगर दलित फिर भी मर रहा है ।

हमारी रीति भी निराली है । दुनिया वर्ग संघर्ष से जूझ रही है और हम अभी तक अपने अतीत से चिपटे हुए वर्ण संघर्ष में ही अटके हैं । वर्ग संघर्ष तरक़्क़ी का मार्ग प्रशस्त कर रहा है और वर्ण व्यवस्था तरक़्क़ी के बावजूद आदमी के पायदान नहीं बदलने दे रही। हज़ारों साल की हमारी ग़ुलामी का असली खलनायक क्या यही वर्ण व्यवस्था नहीं है जिसने बीस फ़ीसदी मेहनतकश दलित आबादी को कोऊ हो नृप हमें का हानि जैसे भाव देकर उदासीन कर दिया ? लानत है इस व्यवस्था पर जिसमें मेहनतकश शूध्र कहलाए और बैठ कर खाने वाला उच्च वर्ग । अब एसे माहौल से निराश लोग अपना धर्म त्यागें तो इसमें आश्चर्य क्या ? आश्चर्य तो इसमें है कि अपने को ऊँचे पायदान समझने वाले अभी भी ख़ुद को नहीं बदल रहे ।

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