चिट्ठी आई है

रवि अरोड़ा

सालों पहले एक फ़िल्मी गाना बहुत चर्चित हुआ था- चिट्ठी आई है । पंकज उधास द्वारा गाए गए इस गीत ने विदेशों में बसे न जाने कितने लोगों की घर वापसी करा दी थी । बताते हैं कि मनोज कुमार की फ़िल्म पूरब और पश्चिम ने भी यह कमाल कर दिखाया था । पता नहीं अब एसी फ़िल्में क्यों नहीं बनती जो प्रवासियों को लौटने के लिए प्रेरित करे । उलटा ग्लोबलाईजेशन के इस दौर ने विदेशों में बसने की ललक को और बढ़ा ही दिया है । बचपन से ही ब्रेन ड्रेन और प्रतिभा पलायन जैसे शब्द सुनते आ रहे हैं। आजादी के समय से ही इस तरह की लफ़्फ़ाज़ी हो रही है । सयाने हमेशा कहते थे कि देश में अवसरों की कमी नहीं है और जो बाहर जा रहे हैं एक दिन लौट कर वापिस यहीं आएँगे । कई दशक हो गये एसी बातें सुनते सुनते । मगर कोई लौट कर आता नहीं दिखता । आँकड़े चुग़ली करते हैं कि विदेश जाकर बसने वालों की तादाद हर साल तेज़ी से बढ़ ही रही है। अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे विकसित देश युवाओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं । युवाओं के तो जैसे सपनो में ही बसते हैं ये मुल्क । हाल ही मैं दर्जनों एसे युवाओं से मिला जो विदेश में जाकर बस गए हैं । लौट कर आने के लक्षण किसी में नहीं दिखे । इसके विपरीत विदेश का ख़्वाब वे यहाँ रह रहे युवाओं की आँखों में और छोड़ गये । बातचीत में वे विदेश की सबसे बेहतरीन चीज़ बताते हैं वहाँ का सिस्टम । हर काम का निश्चित तरीक़ा और उसके पालन की लोगों और सरकार में प्रतिबद्धता । हालाँकि वहाँ मिलने वाले ऊँचे वेतनमान, स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा जैसी सुविधाओं की भी बात भी वे करते हैं । अनेक खुल कर कहते हैं कि भारत में प्रतिभाओं की क़द्र नहीं है और सारी उम्र मेहनत करके आप अपना घर बनाना तो दूर अच्छी कार भी नहीं ख़रीद सकते । इन युवाओं की बातें सुन कर मन विचलित सा हो गया । क्या वाक़ई हम अपनी प्रतिभाओं को सहेज कर रखने की क्षमता नहीं रखते ?

दो साल पहले देश के बड़े अख़बार हिंदुस्तान टाईम्स ने एक सर्वे छापा था । इसके अनुसार देश के आधे युवा अपने देश को पसंद नहीं करते । पिछत्तर परसेंट युवाओं ने कहा की वे मजबूरीवश यहाँ रह रहे हैं । 66 फ़ीसदी युवाओं ने कहा कि यहाँ उन्हें अपना भविष्य असुरक्षित लगता है । ज़ाहिर है कि पिछले दो सालों में एसा कोई चमत्कार नहीं हुआ जिससे युवाओं की सोच बदली हो । अब जिस देश की 65 फ़ीसदी आबादी युवा हो , वहाँ इस तरह की बातें डराने वाली तो लगती ही हैं । एक तरफ़ हमारे युवाओं में विदेशों में बसने की ललक है वहीं कनाडा और आष्ट्रेलिया जैसे देशों ने हमारे युवाओं के लिए दरवाज़े खोल दिये हैं । अक्तूबर 2017 से कनाडा ने अपनी इमिग्रेशन पोलिसी में इतनी ढील दी है कि वहाँ जाकर जाकर बसने वाले भारतीयों की संख्या दोगुनी हो गई है । कनाडा एक करोड़ 81 लाख रुपये अपने यहाँ निवेश करने वालों को हाथों हाथ नागरिकता देता है । वैसे कनाडा जैसे 27 अन्य विकसित देश भी हैं जो पैसे लेकर नागरिकता देते हैं । भारत में बढ़ती अराजकता, असुरक्षित निवेश, रोज़गार के अवसरों का अभाव, बढ़ती भीड़-भाड़ और प्रदूषण से परेशान पैसे वाले इस स्कीम का जम कर लाभ उठा रहे हैं । शायद एसे ही कुछ कारण हैं कि दुनिया भर के देशों में भारतीयों की संख्या दो करोड़ को भी पार कर गई है । प्रवासियों पर नज़र रखने वाली अंतराष्ट्रीय संस्था डीईसीडी के अनुसार विदेश बसने वालों में भारतीयों की संख्या दुनिया भर में सबसे ज़्यादा है ।

बेशक विदेश जाकर बसने वाले भारतीय देश की अर्थव्यवस्था में भी योगदान देते हैं । हमारी जीडीपी में उनका योगदान साढ़े तीन परसेंट है । पिछले साल ही इन प्रवासियों ने 5 लाख 68 हज़ार करोड़ रुपया भारत भेजा । यह रक़म बीस परसेंट सालाना की दर से बढ़ भी रही है मगर अधिकांशत वही लोग पैसे भेजते हैं जो नए नए वहाँ गए हैं अथवा जिनके माता-पिता जीवित हैं । रुपया भेजने का सिलसिला बस कुछ सालों तक ही चलता है और उसके बाद हमारे आदमी की पूरी प्रतिभा पराई हो जाती है । चंद वर्षों पहले देश ने मेक इन इंडिया जैसे सपने के मार्फ़त ब्रेन ड्रेन थमने का सपना देखा था मगर पूर्व के अनेक अन्य सपनों की तरह वह भी चकनाचूर हो गया ।डर लगता है कि सूरत नहीं बदली तो कहीं पूरे मुल्क की अर्थव्यवस्था उत्तराखंड जैसे राज्य की मनीआर्डर आधारित जैसी न हो जाये । अब सरकार का तो पता नहीं वह कुछ कर पाएगी भी अथवा नहीं । ए फ़िल्म वालों कम से कम तुम ही साल दो साल में एसी फ़िल्म बना दिया करो जिसे देखकर प्रवासी चिट्ठी आई है- चिट्ठी आई है गाते हुए दौड़े चले आया करें ।

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