घोड़ा, घास और तबलीगी जमात

रवि अरोड़ा
आज जब सारा मुल्क तबलीगी जमात वालों को गरिया रहा है तो मुझे लगा कि क्यों न मैं भी लगे हाथ अपनी भड़ास निकाल लूँ । देश भर में क़ोरोना वायरस फैलाने में उनकी भूमिका के लिए यूँ भी उन्हें मुआफ़ नहीं किया जा सकता । बेशक निज़ामुद्दीन मरकज़ से मेरी कोई जाति अदावत नहीं है मगर उनके बाबत मेरी शिकायतें भी बहुत हैं । दरअसल सूफ़ी संगीत से मुझे बेहद लगाव है और वही सुनने की चाह में अक्सर हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर चला जाता हूँ । बेशक तबलीगी जमात का मरकज़ भी वहीं है मगर दरगाह और उनके अकीदतमंदों से वे लोग हमेशा बैर ही रखते हैं । निज़ामुद्दीन बस्ती के बीस हज़ार से अधिक मुसलमान छोटे छोटे दबड़ों जैसे घरों में रहते हैं वहीं बीस हज़ार गज़ से भी बड़े क्षेत्र में फैले जमात के परिसर में उसके लोग बड़ी बड़ी कोठियाँ बना कर रह रहे हैं । लगभग छः महीने पहले जमात वालों ने दरगाह की ओर जाने वाला रास्ता भी बंद करवा दिया और अब अकीदतमंदों और स्थानीय आबादी को दूर का चक्कर काट कर बाउली गेट की ओर से दरगाह जाना पड़ता है । चूँकि जमात को विदेशों से बहुत पैसा आता है अतः उन्होंने दरगाह जाने वाले रास्ते की बीस बीस लाख रुपये की दुकानें एक एक करोड़ में ख़रीद लीं और फिर अपना क़ब्ज़ा होते ही उस रास्ते पर बेरिकेडिंग लगवा दिये ।
आम तौर पर हम लोग यही मानते हैं कि मुल्क का हर मुसलमान जमाती है और मरकज़ से जुड़ा हुआ है , जबकि एसा है नहीं । देश में सुन्नी मुस्लिमों के दो बड़े विचार केंद्र हैं । एक है देवबंदी और दूसरे हैं बरेलवी । इनके अतिरिक्त शिया, सूफ़ी और अहमदिया जैसे अन्य मुसलमान भी हैं । बेशक एक समय में तबलीगी जमात को देवबंदियों ने ही शुरू किया था मगर अब उन्होंने भी इनसे अपने को अलग कर लिया है । उनके द्वारा संचालित मदरसों में अब जमात से जुड़ी बातें पढ़ाने की भी मनाही है । दरअसल तबलीगी जमात वाले इनके कट्टरपंथी हैं कि हिंदुस्तान का आमतौर पर प्रगतिशील और दरगाहों और मज़ारों पर माथा टेकने वाला मुसलमान उनके साथ दो कदम भी नहीं चल पाता । तबलीगी जमात का एक ही लक्ष्य है और वह है मुसलमानों को कुँए का मेंढक बनाना । वे गीत-संगीत और मनोरंजन को इस्लाम के ख़िलाफ़ मानते हैं । ग़ैर मुस्लिमों से दोस्ती को नाजायज़ क़रार देते है और उन्हें चौदह सौ साल पुराने हुलिये यानि एक फ़ुट लम्बी दाढ़ी और टखनों से ऊँचे पायजामे तक ही महदूद रखना चाहते हैं । चूँकि उन्हें सूफ़ी संगीत और मज़ारों पर गाई जाने वाली क़व्वालियाँ हराम लगती हैं सो अपने मन में भी उनके प्रति खुंनस का भाव है । हालाँकि उन्होंने यह काम तो अच्छा किया कि बड़े पैमाने पर मुस्लिमों से शराब छुड़वाई और उन्हें कम तौलने और चोरी-चक़ारी से बाज़ आने को कहा मगर कुल मिला कर उनके सारे जतन मुस्लिमों को कट्टर बनाने के ही हैं ।
जानकार बताते हैं कि तबलीगी जमात की शुरुआत 1926 में काँधला के मौलाना इलियास ने दिल्ली से सटे मेवात क्षेत्र से की थी । निज़ामुद्दीन मरकज़ इस जमात का आज सबसे बड़ा केंद्र है और मौलाना साद आजकल इसके मुखिया हैं जिनकी दिल्ली पुलिस को तलाश है । जमात का दायरा डेढ़ सौ से भी अधिक देशों तक फैला है और दुनियाभर में इससे जुड़े लोगों की संख्या पंद्रह-बीस करोड़ बताई जाती है । दक्षिण एशिया में इसके हमदर्द ज़्यादा हैं मगर इसे पैसा कट्टर मुस्लिम देशों से ही आता है । इसी पैसे के बल पर वह मुस्लिमों को जहालत की ओर धकेल रहा है । अजब तो यह है कि उसकी जहालत अब हमारे पूरे समाज पर पसरी नज़र आ रही है । हिंदू समेत अन्य सभी धर्म के लोग हर मुसलमान को जमाती समझ कर उसे लपेट रहे हैं और उधर जमात को दी गई गाली को हर मुस्लिम अपने को दी गई समझ कर जवाब दे रहा है । लगता है कि यह सिलसिला कम से कम हाल-फ़िलहाल में तो रुकने वाला नहीं है । रुकना भी चाहेगा तो मुल्क की राजनीति इसे रुकने नहीं देगी । अब यही आपसी बैर तो उसकी खुराक है । घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या ?

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