घूँघट की ज़िद

रवि अरोड़ा
आज की पीढ़ी बेशक इसका उपहास करे मगर मेरी उम्र के लोगों ने वह दौर ज़रूर देखा है जब नई नवेली दुल्हनें अपने ससुर और जेठ से घूँघट किया करती थीं । परंपराओं की डोर से बंधी अनेक महिलायें तो पूरा जीवन इस अनुशासन का पालन करती थीं । गाँव-देहात में तो आज भी यह रिवाज सा ही बना हुआ है । ख़ैर मैं बात कर रहा हूँ उस दौर की जद्दोजहद की जिसमें आधुनिक विचारों वाली बहुएँ घूँघट की बंदिश को मानने से इनकार कर देती थीं । तब घरों में तूफ़ान सा आ जाता था और बड़े-बूढ़े बहू की घूँघट हटाने की फ़रमाइश से बिदक जाते थे । बहू का तर्क होता था कि एक ही घर में रहते हुए यह कैसे सम्भव है कि दिन भर घूँघट किये रहो । घर के सौ काम होते हैं , हम उन्हें करें या दिन भर पल्लू सम्भालें । बहू का यह भी तर्क होता था कि जाने अनजाने दिन में कई बार मेरा चेहरा ससुर और जेठ को दिख तो जाता ही है , फिर यह ड्रामा क्यों ? कहना न होगा कि इस विवाद में जीत अंतत बहू की ही होती थी और परेशानी के सबब बने घूँघट की विदाई हो ही जाती थी । मुझे लगता है कि लॉकडाउन की बंदिशें भी अब कुछ कुछ नई दुल्हन के घूँघट जैसी हो गई हैं और एक परम्परा से अधिक अब इसके कोई मायने नहीं रहे । आजकल शहरों में ख़ूब भीड़ है । सड़कों पर एक बार फिर दूर दराज़ के मज़दूरों की रेलमपेल है । फैक्टरियाँ खुल गई हैं , दुकानों पर ग्राहकों की मारामारी है । जिसे जहाँ जाना है वह जा ही रहा है फिर यह लॉकडाउन का ड्रामा किसके लिए हो रहा है ? यदि पालन करा पाते तो बेशक सोशल डिसटेंसिंग और लॉकडाउन का विचार बहुत अच्छा था मगर अब जब दिन में दस बार दुल्हन का मुँह देख ही लेते हो तो क्यों बेचारी को हलकान करते हो , क्यों घूँघट की बंदिश ख़त्म नहीं कर देते ? अजी शर्म घूँघट में नहीं आँख में होती है और बंदिश भी वह ही है जिसका अनुपालन हो सके । कोरोना तो अब वापिस जाना नहीं है फिर क्यों नहीं अब स्वअनुशासन की बात करते ?
मेरठ मार्ग पर बीती रात सैकड़ों मज़दूरों को पुलिस ने रोक लिया । ये लोग पैदल ही दूर दराज के शहरों में जाना चाहते थे । पुलिस ने कहा कि जब तुम्हारे लिए गाड़ियाँ और बसें हैं तो हम तुम्हें पैदल कैसे जाने दें । बेशक कुछ मज़दूर बेवक़ूफ़ होंगे जो रेलगाड़ी और बस की बजाय यूँ सड़क पर भूखे मर रहे होंगे मगर क्या सारे के सारे मूर्ख हैं ? ज़ाहिर है कि ट्रेन या बस नहीं मिली होगी तभी पैदल जा रहे हैं। दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में दो वक़्त की मुफ़्त रोटी अथवा राशन मिल रहा होता तो कोई क्यों बीवी बच्चों समेत भूखा सड़क पर आता ? सरकारी दावों में क्या क्या झोल हैं यह तो नहीं पता मगर लगभग दो महीने बाद भी दूर दराज़ के श्रमिक सड़क और रेल की पटरियों पर दिख रहे हैं तो ज़मीनी हक़ीक़त स्वतः समझ आ जाती है ।
सरकारों की एक ख़ास परम्परा होती है कि वे अपनी भूल कभी स्वीकार नहीं करतीं । करोड़ों प्रवासी मज़दूर सड़क पर निकल पड़ेंगे यह अनुमान सरकारें नहीं लगा सकीं। अब यह भी ठीक है कि सरकार किसी की भी हो अचानक सड़कों पर आये लाखों-लाख मज़दूरों के परिवहन और भोजन की व्यवस्था नहीं कर सकती थी । मगर एसे में मोदी जी को क्या आम आदमी की मदद नहीं लेनी चाहिये थी ? ताली-थाली बजवाने और दीया जलवाने की बजाय जनशक्ति का कोई बेहतर इस्तेमाल भी तो किया जा सकता था ? यदि वे किसानों का आह्वान करते कि अपनी ट्रेक्टर ट्रालियाँ निकालो और अपने जिले की सीमा तक इन मज़दूरों को छोड़ आओ । सड़कों के किनारे बने मकान वालों से कहते कि आपके घर के आगे से कोई भूखा न निकल जाये , तो शायद यह जन ऊर्जा का बेहतर उपयोग होता । मोदी जी जननेता हैं सो उनके आदेश का अनुपालन भी होता । ख़ैर अब जो हो गया सो हो गया मगर अब तो सम्भल जायें । अब जब अघोषित रूप से हर काम हो ही रहा है तो क्यों हर काम से पहले परमिशन-परमिशन का खेल हो रहा है ? साहब चुपके से बहू का मुँह देख ही लेते हो तो फिर घूँघट की ज़िद भी छोड़ो । बहू घर का कुछ काम-धाम ही कर ले ।

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