ग्लेडिएटर नहीं हैं सैनिक

रवि अरोड़ा

इत्तेफ़ाक से कल फिर हालीवुड की चर्चित फ़िल्म ग्लेडिएटर देखी । रिडली स्क़ोट द्वारा निर्देशित और रसल क्रो की शानदार अदाकारी से सजी लगभग दो दशक पुरानी इस फ़िल्म में रोमन साम्राज्य का वह काल बेहद क़रीब से देखने को मिलता है जिसमें सिर्फ़ लोगों का मनोरंजन करने के लिए कुछ ग्लेडिएटर यानि तलवारबाज़ ग़ुलाम जान की बाज़ी लगा कर एक दूसरे की नृशंस हत्या करते थे । ग्लेडिएटर अपनी जान बचाने को दूसरे ग्लेडिएटर की जान लेता था और स्टेडियम में बैठी हज़ारों की भीड़ इन ग़ुलामों की दर्दनाक मौत में अपना मनोरंजन तलाशती रहती थी । भारत-पाकिस्तान के बीच बने युद्ध के हालात में मुझे यह फ़िल्म इतनी मौजू लगी कि फ़िल्म में हत्याओं का खेल देख रही भीड़ में मुझे अपने इर्द गिर्द के वो तमाम लोग भी दिखने लगे जो सुबह शाम युद्ध की माँग कर रहे हैं और इस बार कुछ आर पार का होने की बात बार बार दोहरा रहे हैं ।

शुक्र है कि युद्ध के बादल छँट रहे हैं । समय रहते पाकिस्तान को सदबुद्धि आ गई कि भारत जैसे मज़बूत देश से सीधे टक्कर लेना अब उसके बूते में नहीं । वह तो फिर कभी धोखे से पीठ में छुरा घोपनें की ही कोशिश करेगा । पुलवामा के बाद देश में जो हालात बने थे , उसी के मद्देनज़र हमारी सरकार ने घर में घुस कर आतंकियों को ठोका । वाक़ई मोदी सरकार के लिए यह बड़ा फ़ैसला था और बिना दृढ़शक्ति के कोई नेता अथवा सरकार एसा क़दम नहीं उठा सकती थी । मोदी जी और हमारी सेना ने वह कर दिखाया , जो दुनिया के समक्ष हम भारतीय का सिर गर्व से ऊँचा कर गया । मगर अब जब आतंकियों को सबक़ सिखाया जा चुका है । अपने पायलेट अभिनंदन को रिहा करने के लिए हम पाकिस्तान को बिनाशर्त मजबूर कर चुके हैं , फिर भी युद्धोन्मादियों का कलेजा ठंडा क्यों नहीं हो रहा ? क्यों वे अब भी देश को युद्ध की स्थितियों से निकलने नहीं देना चाहते ? सोशल मीडिया , टीवी चेनल्स , राजनीतिक जनसभाओं और गली मोहल्लों में ये लफ़्फ़ाज़ बहादुर क्यों अपनी आस्तीनें नीचे करने को तैयार ही नहीं हो रहे ? मज़ाक़ देखिये कि जिनके पूरे खानदान में कभी कोई फ़ौज में नहीं गया , जिनकी मोटी तोंद पर कभी कोई बेल्ट कारगर नहीं हुई और जिन्होंने कभी मुर्ग़े की लड़ाई भी नहीं देखी वही सबसे अधिक युद्ध और इसबार आर पार की बात कर रहे हैं । कोई सयाना कह रहा था कि जिसके अपने घर का कोई सीमा पर नहीं होता, युद्ध केवल उनके दिमाग़ की ख़लिश होती है वरना फ़ौजियों के परिजन तो दिन रात यही कामना करते हैं कि चहुँओर अमन ही हो । अख़बारों में लगभग रोज़ शहीद हुए किसी जवान और उसके बिलखते परिजनों की तस्वीरें देखने को मिलती हैं । बड़ी हैरानी होती है कि एसी तस्वीरें भी युद्धोन्मादियों का कलेजा दहला नहीं पा रहीं ।

मैं जानता हूँ कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए सत्ता में वापसी आसान नहीं होता । पुलवामा से पहले भाजपा के लिए भी हालात नाज़ुक थे । हालाँकि घाघ लोगों का तब भी दावा था कि एन चुनाव के वक़्त कुछ एसा होगा जिससे भाजपा के प्रति फिर लोगों का प्यार उमढ़ पड़ेगा । हुआ भी एसा ही । अब मोदी जी तो मोदी जी ठहरे । उन्होंने बड़ी चतुराई से देश प्रेम की बही बयार को मोदी और भाजपा प्रेम में बदल दिया । जाति-धर्म से उठ कर देश भक्ति के जज़्बे में एक हुए पूरे भारत को अब तिरंगे के नीचे से निकाल कर चुपके से भाजपा के झंडे के नीचे लाने की भी जुगत हो रही है । पार्टी की तमाम उछलकूद इसी दिशा में है । युद्ध का जुनून कम से कम चुनाव तक क़ायम रहे , यह खेल खुल कर पार्टी खेल रही है । श्रीमान मोदी जी आप सत्ता में लौट आओ , कम से कम मुझे इसमें कोई एतराज़ नहीं है। मगर कम से कम अपने भक्तों और अपनी ज़बान पर इतनी लगाम ज़रूर रखना कि जाने अनजाने हम फिर किसी युद्ध की ओर बढ़ जायें । बेशक कुछ नासमझ लोगों के लिए हमारे सैनिक ग्लेडिएटर हों मगर आप तो ज़रूर याद रखना कि लाखों माओं के वे लाल हैं , लाखों के सुहाग और पिता भी हैं ।

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