गुरु घर

रवि अरोड़ा

एक क़रीबी की हाल ही में मृत्यु हो गई । निकट के एक गुरुद्वारे में रस्म पगड़ी व उठावनी का आयोजन हुआ। मातमपुर्सी को भारी संख्या में लोगबाग़ वहाँ आ रहे थे । जो भी नया आदमी आता , सामने रखी गोलक में पहले कुछ रूपये डालता और फिर गुरु ग्रंथ साहब के समक्ष आधा-अधूरा माथा टेकता । शीश नवाने के बाद मृतक की तस्वीर पर फूल चढ़ाता और दस-बीस रूपये वहाँ भी रख देता । कुछ अनुभवी लोग इसके बाद शबद कीर्तन कर रहे रागियों की ओर भी मुड़ते और कुछ रुपये उनके हार्मोनियम के पास भी अकड़ से रख देते और फिर सबको नमस्कार करते हुए अपना स्थान लेते । कीर्तन के बाद अरदास का समय आया । माइक पर गुरुद्वारे के पाठी साहब आए और आँखें बंद कर व हाथ जोड़ कर अरदास करने लगे । मृतक के परिजनों को प्रसन्न करने की ग़रज़ से पाठी ने अरदास में कुछ बातें अपनी ओर से भी जोड़ दीं , जिनकी परम्परा नहीं है । परिवार और उनके निकट के लोग फिर उठने लगे और पाठी के जुड़े हाथों में रूपये फँसाने लगे । इसपर एसी होड़ लगी कि देखते ही देखते प्रार्थना को जुड़े पाठी के हाथ मुट्ठी में तब्दील हो गए जिसमें बाहर तक निकलने की हद तक रुपये भर गए । मृतक के परिजनों ने उठावनी के बाद बिस्तर , कम्बल और बर्तन आदि पाठी को भेंट किये और सभी आगंतुकों के लिए किए गए चाय नाश्ते के बेहतरीन प्रबंध को सम्भालने लगे। गुरु का कढ़ा प्रसाद लेने को बेशक कुछ लोगों ने हाथ आगे नहीं बढ़ाए मगर नाश्ते में सबकी रुचि दिखी । मैं हैरान परेशान यह सब तमाशा देख रहा था । इन सभी क्रियाकलापों में अनेक चीज़ें मुझे गुरु घर की मर्यादा के अनुरूप नहीं लगीं । मुझे बार बार लगा कि जो कुछ भी हो रहा है गुरुओं ने तो कम से कम यह नहीं सिखाया ।

मेरे माता-पिता सिख धर्म के अनुयायी हैं । मुझे भी गुरुओं की वाणी से बहुत लगाव है । यही कारण रहा कि अब तक का जीवन गुरुद्वारों की ड्योढ़ी पर सिर नवाते हुए ही गुज़रा है । इस धर्म में कुछ ख़ास है जो अन्य कहीं नज़र नहीं आता । सेवा का जो भाव सिक्खों में है उसकी पूरी दुनिया क़ायल है । मगर समय के साथ सिक्खों में भी वही कुरीतियाँ आती दिखने लगी हैं , जो अन्य धर्मों में हैं । संगत और पंगत की रीति कहीं पीछे छूटती दिखती है । हालाँकि गुरुपर्व , अर्जन देव जी के शहीदी दिवस और बैसाखी पर लंगर और छबील की व्यवस्था अधिकांश गुरुद्वारों में अभी भी हो रही है मगर संगत द्वारा तैयार दाल-रोटी का प्रसाद नहीं अब हलवाइयों द्वारा तैयार शादी जैसा भोजन बँटता है । पत्तल की जगह प्लास्टिक और थर्मोकोल के बर्तनों ने ले ली है और कई जगह पंगत में बैठा कर नहीं मेज़-कुर्सी पर सजा कर भोजन कराया जाता है । जिन इलाक़ों में शहीदी दिवस पर मीठे जल की छबील लगती है , अगले दिन वहाँ एक एक फ़र्लांग तक प्लास्टिक के ग्लास बिखरे मिलते हैं । गुरुपर्वों पर निकलने वाले जुलूसों की लम्बाई बेशक बढ़ती जा रही है मगर सही मायने में धर्म से जुड़ी प्रभात फेरियाँ ख़त्म होती जा रही हैं । हालाँकि गुरुद्वारों में माथा टेकने वाले कम नहीं हुए मगर तसल्ली से बैठ कर पाठ सुनने वाले हर गुरुद्वारे में अब ऊँगलियों पर गिनने लायक संख्या में ही रह गए हैं । पूरे केश और सिख बाना युवाओं को भाता नहीं और बुज़ुर्ग उनसे अब इसकी उम्मीद भी नहीं करते । हालाँकि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंध कमेटी ने शादी घरों और गली मोहल्लों में ग्रंथ साहब के प्रकाश पर पाबंदी लगा दी है मगर शादी वाले घरों में अभी भी बेअदबी हो रही है । अकाल तख़्त , आनंदपुर साहब , पटना साहब , दमदमा साहब और नांदेड़ साहब के प्रमुख पाँच सिख साहेबान की कमेटी समाज की कुरीतियों को लेकर बेहद सक्रिय है मगर पता नहीं क्यों इन सभी बातों की ओर उनका ध्यान क्यों नहीं जाता । बाक़ी सब तर्क-कुतर्क तो शायद मेरे पल्ले पड़ भी जायें मगर अरदास करते पाठी के जुड़े हाथों में रूपये फँसाने की क्या तुक है , यह मेरी समझ से बाहर है । क्या कोई विद्वान इसे समझने में मेरी मदद करेगा ?

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