गाल बजाई

रवि अरोड़ा
मेरे वे मित्र बड़े विनोदी स्वभाव के हैं । चूंकि अच्छे खासे पैसे वाले हैं सो कई साल पहले एक मेडिकल कालेज में ट्रस्टी भी बन गए थे । मेडिकल कॉलेज के बाबत जब भी उनसे बात करो तो वे हर बार यही कहते हैं कि मेडिकल कॉलेज तो वही खोले जिसका ताज़ा बाप मरा हो और मोटे पैसे छोड़ कर गया हो । आज जब हजारों भारतीय मेडिकल छात्रों के यूक्रेन में फंसने की खबरें आ रही हैं और प्रधानमंत्री मोदी जी ने भी सलाह दी है कि भारतीय छात्र अपने देश के मेडिकल कॉलेजों में ही पढ़ें, मुझे अपने वह मित्र बहुत याद आए । ज़ाहिर है ऐसे में मेरा उन्हें फोन मिलाना लाज़मी था और उनसे यह सवाल करना भी मोजू था कि ये छात्र इतनी दूर यूक्रेन में आखिर गए ही क्यों ? अपने पूर्व परिचित अंदाज के विपरीत इस बार मित्र ने बड़ी गंभीरता से भारतीय मेडिकल शिक्षा की पोल खोली और मुझे सहमत करके ही माने कि वाकई देश में मेडिकल शिक्षा अब दूर की कौड़ी है और भारतीय छात्रों के लिए यूक्रेन के मेडिकल कॉलेज चुनाव नहीं मजबूरी है ।

मित्र ने बताया कि एक दौर था जब मैनेजमेंट कोटे की सीटों के बदले में मोटी कैपिटेशन फीस कॉलेज प्रबंधकों को मिल जाती थी और मेडिकल कॉलेज मुनाफे का बिजनेस था मगर अब सभी सीटें प्रवेश परीक्षा के तहत ही भरनी होती हैं और फीस पर भी सरकारी नियंत्रण है अतः मोटी कमाई खत्म हो गई है । बकौल उनके इससे भी गुजारा किया जा सकता है मगर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया जिससे नियंत्रण में देश के सभी मेडिकल कालेज हैं , जीने नहीं देता । वे बताते हैं कि उम्मीद के विपरीत मोदी शासन में काउंसिल में भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ गया है और अधिकारी कदम कदम पर पैसा मांगते हैं । यूं भी जब तक चार पांच बैच पास आउट न हो जाएं मेडिकल कालेज घाटे में रहते हैं , ऐसे में काउंसिल के अधिकारियों का खुला मुंह यह घाटा कभी थमने ही नहीं देता । दो ढ़ाई सौ करोड़ रुपए लगा कर अब कोई घाटा भी उठाए और अधिकारियों की घुड़कियां भी सुने , ऐसा कैसे हो सकता है ? नतीजा अब देश में निजी क्षेत्र के नए मेडिकल कालेज खुलने बंद हो गए हैं । वे बताते हैं कि देश में मेडिकल की मात्र अस्सी हजार सीटें हैं और उनके लिए बीस लाख से अधिक छात्र प्रवेश परीक्षा देते हैं । सरकारी कॉलेज न के बराबर हैं अतः बच्चे निजी कालेजों की ओर रुख करते हैं । यहां भी एक सीट के लिए बीस बीस बच्चे कतार में होते हैं सो मजबूरीवश बच्चों को यूक्रेन जैसे देशों का सहारा लेना पड़ता है । यूक्रेन का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत अच्छा है और वहां पांच साल की मेडिकल शिक्षा लगभग बीस लाख में निपट जाती है जबकि भारत में यह पचास लाख से एक करोड़ की बैठती है । यूक्रेन की मेडिकल शिक्षा को भारत ही नहीं इंग्लैंड और पूरे यूरोप समेत अनेक देश मान्यता देते हैं अतः आर्थिक रूप से कमजोर छात्र यूक्रेन का रुख करते हैं ।

मित्र की बातें सुन कर मैं थोड़ा हैरान था कि क्या ये सब बातें मोदी जी को पता नहीं होंगी ? यदि पता हैं तो फिर उन्होंने क्यों कहा कि भारतीय छात्र अपने देश में ही मेडिकल की पढ़ाई करें ? मेडिकल काउंसिल के भ्रष्टाचार है , क्या यह बात उनसे छुपी होगी जबकि उसके तमाम बड़े पदों पर गुजराती ही काबिज हैं ? जरूरत के अनुरूप नए सरकारी मेडिकल कालेज तो चलो आर्थिक मजबूरियों के चलते नहीं खुल सकते मगर निजी क्षेत्र को इसके लिए प्रोत्साहित करके को पिछले सात सालों में क्या हुआ ? जिस गति से देश की आबादी बढ़ रही है , उस गति से नए डाक्टर नहीं तैयार किए गए तो कोरोना जैसी महामारियों के दौर में क्या होगा , क्या यह सवाल उनके लिए विचारणीय नहीं है ? क्या सचमुच इस दिशा में वे कुछ गंभीर प्रयास करेंगे या फिर अन्य मामलों की तरह केवल गाल बजाई से ही काम चलाएंगे ?

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