खुराक

रवि अरोड़ा

मेरी पत्नी बेहद धार्मिक विचारों की है । इस बार पवित्र माने जाने वाले कार्तिक माह में वह सुबह मुँह अंधेरे उठकर स्नान-ध्यान और तुलसी की पूजा के पश्चात मंदिर में पूरे साजो-सामान के साथ कथा सुनने जाती रही । खटपट से मेरी भी नींद खुल जाती थी । मैंने पूछा कि पहले तो एसा नहीं करती थीं तो उसने बताया कि पहले एसे आयोजन मंदिर में होते ही नहीं थे । मुझे हैरान करने के लिए उसका यह जवाब काफ़ी था । तो क्या हमने अपने धर्म में कुछ और नया जोड़ लिया है ? हालाँकि हिंदू कलंडर के इस आठवें माह का महत्व मैं पहले से ही जानता था और बचपन से ही अपनी माँ को भी इस माह में धार्मिक रीतिरिवाज के अनुरूप कुछ न कुछ करते देखता रहा हूँ मगर अब इस माह में कुछ और नया जुड़ना मेरे लिए कौतुहल का विषय रहा । वैसे अपने धर्म को दिन प्रतिदिन बदलते हुए तो मैं दशकों से देख रहा हूँ । बहुत कुछ नया इसमें जुड़ रहा है तो बहुत कुछ पीछे भी छूट रहा है । इस बदलाव के गवाह आप भी तो हैं । ज़रा याद तो कीजिए क्या क्या कुछ बदला है मेरे और आपके देखते ही देखते ।

बचपन कवि नगर में बीता । वहाँ हर मंगलवार को किसी न किसी के घर में कीर्तन होता था । हारमोनियम और ढोलक पर एक से एक कर्णप्रिय भजन गाए जाते थे । हर दो चार दिन बाद किसी न किसी घर के बाहर लाउडस्पीकर लगा होता और राम चरित मानस की चौपाइयाँ सुनाई दे जाती थीं । अब यह रिवाज ख़त्म सा हो गया है । लोग भी क्या करें ? केवल बताशे से तो काम अब चलता नहीं । सबकी देखा-देखी प्रसाद के नाम पर हलवाई ही बैठाना पड़ जाता है । दूसरी बात सम्पूर्ण मानस का पाठ रख भी लें तो पढ़ने वाले नहीं मिलते । अब तो इक्का दुक्का जगह सुंदर काण्ड के पाठ की ही ख़बरें मिलती हैं ।

एक ज़माना था जब संतोषी माँ का जलवा था । जिसे देखो वही सोलह शुक्रवार संतोषी माँ का व्रत रखे हुए मिलता था । मंदी का दौर था और ऊपर से आपातकाल , एसे में संतोष ही सबसे बड़ा धन था । प्रसाद भी गुड़ चने का । समाज के हालात के पूर्णत अनुरूप । अब जब समाज में संतोष ही नहीं रहा तो संतोषी माता क्या काम ? अब तो वैभव का ज़माना है अतः शुक्रवार को संतोषी नहीं वैभव लक्ष्मी की पूजा और उनके नाम का व्रत रखा जाने लगा है । कारोबार और नौकरियों में अनिश्चितता है तो उसे लेकर भय भी बढ़ा है । एसे में भोले भाले ब्रह्मा-विष्णु-महेश पर बात नहीं ठहरती और लोगबाग़ अपना शनि सुधारने को हर शनिवार

शनि मंदिर के बाहर लम्बी लम्बी लाइनें लगाने लगे हैं । तीस-चालीस साल पहले पूरे शहर में एक भी शनि मंदिर नहीं था मगर अब हर मोहल्ले में एक-दो हैं । अचानक आती विपदाओं का ख़ौफ़ भैरव के मंदिर पर बोतलें चढ़ाने वालों की तादाद भी बढ़ा रहा है । एक वक़्त था जब गली गली जगराते होते थे मगर अब यह दौर भी चला गया । रात भर जागने की हिम्मत घर वालों में ही नहीं बची तो कोई और भला क्यों अपनी रात काली करेगा । माता के भक्त अब चौकियों से ही काम चलाते हैं और उसमें भी लोग बाग़ डिनर के समय ही पहुँचते हैं । बड़े शहरों के घरों में शनिवार को माँगने वालों का इंतज़ार ही लोग करते रहते हैं । एकादशी-पूर्णमासी पर घर घर अब पंडताइन नहीं जाती । दूध और मीठी रोटी रोटी देने को सावन में साँप की बांबियाँ अब कोई नहीं ढूँढता । सुबह लोटा लेकर मंदिर में जल चढ़ाने वाली पीढ़ी अब बूढ़ी हो गई है तो मंगल वार को मंदिर में प्रसाद चढ़ाने वालों में भी बेहद कमी आई है।

अपने धर्म की ही क्या बात करूँ और जगह भी तो यही सब हो रहा है । सिखों में गुरुपर्व के जुलूस जितने बड़े हो रहे हैं , प्रभात फेरियाँ उतनी ही छोटी । लोगबाग़ गुरुद्वारे तो ख़ूब जा रहे हैं मगर ऊँच-नीच का भेद मिटाने को बनाए गए सरोवरों की ओर मुँह भी नहीं करते। मुस्लिमों में रोज़ा रखने वाले बेशक ज़्यादा न घटे हों मगर ज़कात देने का अल्लाह का हुक्म तो आम तौर पर कोई नहीं मानता । हाँ हज पर जाने की होड़ ज़रूर लग गई है । इससे समाज में धाक तो बढ़ती ही है साथ में नाम के आगे एक डिग्री और लग जाती है । हाजी फ़लाँ फ़लाँ अली । उधर रविवार को गिरजाघर के बाहर ठेलियाँ भी घटी हैं । लोग गिरजा आएँगे ही नहीं तो सामान कौन ख़रीदेगा ?

कुछ कम हुआ उससे अलग जो नया जुड़ा उसका हिसाब लगाता हूँ तो हाथ आता है उत्सवधर्मिता और अपने समूह का बोध । हैपनिंग और इवेंट के बिना धर्म अकेला पड़ जाता है। हर वह काम जो धार्मिक है वह हमारे हाथ से फिसल रहा है और हर वह शय जो हमें धार्मिक दिखाती है , वह बढ़ी है । अपने समूह से जुड़ाव और उसके सभी टोटके ही अब धर्म है । शायद आज की राजनीति की भी यही खुराक है ।

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