खाई भी हमें देख रही है

खाई भी हमें देख रही है
रवि अरोड़ा
भूतपूर्व आईएएस अधिकारी व मशहूर व्यंगकार अवे शुक्ला की किताब ‘ होली काऊज़ एंड लूज़ कैनन्स – द डफ़र ज़ोन क्रॉनिकल्स ‘ जिसे हिंदी में “डफर जोन” के रूप में जाना जा रहा है , आजकल धूम मचाए हुए है। हास्य और व्यंग्य से लबरेज़ ब्लॉग्स के इस संकलन को लेकर हाल ही में ‘ द वायर ‘ के लिए प्रतिष्ठित पत्रकार करण थापर ने अवे शुक्ला का खास इंटरव्यू किया और उसे भी लाखों लोगों ने पसंद किया । अवे शुक्ला अपनी इस किताब में मुख्य रूप से सामाजिक, सांस्कृतिक और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य करते हुए साबित करते हैं कि हम न केवल मूर्खों से घिरे हुए हैं अपितु हम जहां रह रहे हैं, वह क्षेत्र ही मूर्खों का है। मगर पता नहीं क्यों मुझे अभी भी लगता है कि हम लोग अभी भी पूरी तरह मूर्ख नहीं हुए हैं । कहीं थोड़ी बहुत कसर बाकी है। हालांकि एक मूर्ख समाज होने की तमाम शर्तों को हम एक एक कर पूरा करते जा रहे हैं मगर फिर भी कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा है जो हमें खुद को उस क्षेत्र का बाशिंदा कहलाने पर शर्मिंदा नहीं करता , जिसे अवे शुक्ला जैसे लोग अब मूर्खों का इलाका कह रहे हैं ।
अवे शुक्ला कहते हैं कि उत्तरी भारत का वह इलाका जो कथित हिंदुओं का हृदय क्षेत्र है, जहां से नेशनल मीडिया संचालित होता है, जहां शिक्षा कम और जन्मदर अधिक है, जहां धर्मांधता का बोलबाला है और हिंदुत्व ब्रांड की धूम है वही डफर जोन है। जहां के लोगों में सहनशीलता कम और दूसरों पर दोषारोपण करने की प्रवृति अधिक है, जहां के लोग इस्लामोफोबिया से ग्रस्त हैं और जहां क्षेत्रवाद और अति राष्ट्र वाद को ही देशप्रेम समझा जाता है, उसे ही डफर जोन कहते हैं। जहां हर मुस्लिम को पाकिस्तानी अथवा आतंकवादी माना जाए और जो कोई सवाल करे उसे देशद्रोही कहने का चलन हो, उसे डफर जोन के नाम से पुकारा जाना चाहिए । जहां के लोग अंधविश्वासी हों और किसी फासिस्ट को अपना रहनुमा समझें, वे सब डफर हैं और उनका क्षेत्र ही डफर जोन है। जहां शासन प्रशासन बड़बोलों से भय खाता हो और जहां मंत्री संत्री जो मुंह में आए बकते हों, वही डफर जोन की टेरिटरी है। जहां इतिहास को साहित्य और साहित्य को इतिहास की मान्यता हो, जहां लोगों को प्रोपेगेंडा फिल्म दिखाने के लिए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक जुट जाते हों, उसे यकीनन डफर जोन समझा जाना चाहिए । अवे शुक्ला की मानें तो देश में शनै शनै डफर जोन का विस्तार हो रहा है और उत्तरी भारत के बाद अब नॉर्थ ईस्ट व दक्षिण के कर्नाटक जैसे राज्य में भी इसकी आहट सुनाई दे रही है।
पता नहीं अवे शुक्ला से सहमत अथवा असहमत होने के आपके तर्क क्या हैं, मगर वे तमाम सवाल तो बेजा ही हैं जो अपने व्यंग्यों के माध्यम से शुक्ला उठाते हैं। हाल ही में ट्रॉल ब्रिगेड ने जिस प्रकार पहलगाम के शहीद नौसेना के जवान की पत्नी हिमांशी नरवाल के खिलाफ भद्दे कमेंट किए और जिस तरह ऑपरेशन सिंदूर के बारे में जनता के बीच सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे काबिल विदेश सचिव विक्रम मिसरी और उनके परिवार पर ट्रॉल आर्मी ने हमला बोला , उससे अवे शुक्ला से असहमत होने के तर्क बेहद कमजोर तो पड़ ही जाते हैं । मध्य प्रदेश के एक विधायक सेना की आइकन बनी कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन कहें और वहां के उप मुख्यमंत्री सेना को प्रधानमंत्री के चरणों में नतमस्तक करार दें और जहां स्वयं प्रधानमंत्री रगों में खून की जगह सिंदूर बहने जैसे फिल्मी डायलॉग मारते घूमें, वहां हर सूरत अवे शुक्ला का पक्ष मजबूत होता ही दिखाई पड़ता है।
मेरे खयाल से हमारी हिंदी पट्टी को पहली बार किसी ने डफर जोन कहा है, जाहिर है कि यह उपाधि किसी को भी पसंद नहीं आएगी मगर सवाल यह है कि हमारे पास ऐसा क्या है जो हम अवे शुक्ला जैसों को गलत साबित कर सकें। शुक्र है कि अभी एलीट और अंग्रेजी दां लोगों के बीच ही ऐसी उपाधियां दी जा रही हैं मगर क्या वह दिन ज्यादा दूर है जब हिंदी जुबान के लेखक भी हमें भोंदू अथवा मूर्ख कह कर पुकारेंगे ? उत्तरी भारत के इस हिंदी क्षेत्र को गोबर पट्टी तो न जाने कब से कहा ही जा रहा है। देश में गोबर, गोमूत्र को आस्थाओं का प्रतीक बना कर विदेशों में हो रही हमारी किसकिरी को एक बार किनारे भी कर दें मगर उन अन्य मामलों का क्या करें, जिनसे लगातार हमारी जग हंसाई हो रही है। फ्रेडरिक नीत्शे के शब्दों में कहें तो हम खाई को नहीं देख रहे , अब खाई भी हमे देख रही है।

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