ख़ौफ़-ए-खुदा

रवि अरोड़ा

हाल ही में परिवार सहित आगरा घूमने गया था । वहाँ बहुत कुछ अनोखा देखा इसबार । ताज महल में शाहजहाँ और नूरजहाँ की क़ब्रों पर लोग बाग़ रुपए पैसे चढ़ा रहे थे। एसा करने वाले हिंदू और मुस्लिम दोनो थे । ताज महल से फ़तहपुर सीकरी की ओर चले तो जाम में फँस गए । आधे घंटे का सफ़र दो घंटे में पूरा हुआ । कारण था सड़क पर हज़ारों आदमी-औरतों और बच्चों का रेला । पता चला कि ये लोग कैला मैया के मेले में जा रहे हैं । लोगों ने बताया कि यह यात्रा पैदल ही होती है और इन्ही दिनो सम्पन्न की जाती है । इस यात्रा में शामिल हुए हज़ारों लोग कहाँ से आए थे यह तो नहीं मालूम मगर यह ज़रूर पता चला कि ये लोग राजस्थान के सवाई माधोपुर के करौली स्थित कैला मैया के मंदिर जा रहे थे । कांवड़ यात्रा की तरह स्वागत में जगह-जगह लगे पंडाल और ठीक वैसे ही तेज़ डीजे पर बज रहे भजन , भोजन और विश्राम की व्यवस्था । लगभग सभी निम्न आय वर्ग के लोग । ना पाँव में ढंग का जूता और ना ही तन पर क़ायदे का कपड़ा-लत्ता । हाव-भाव और चाल-ढाल से मेहनतकश मगर पढ़ाई लिखाई के औसत होने का अंदाज़ा हो रहा था । सीकरी पहुँचे तो सलीम चिश्ती की दरगाह पर भी गए । दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर और मन्नत के लिए धागे बेचने वाले निकट ही फड़ लगा कर बैठे थे । लोगों को चादर बेचने की ग़रज़ से वे लोग चादर को जबरन टूरिस्ट के सिर से छुआ कर क़ुरान की कुछ आयतें अरबी में बुदबुदाते और फिर मोरपंखी की चँवर से आशीर्वाद नुमा कुछ कर सामने वाले की औक़ात का अंदाज़ा लगा कर चादर की क़ीमत माँगते- दो सौ इक्यावन , पाँच सौ एक अथवा ग्यारह सौ एक । पता नहीं किस भावना से प्रेरित लोग बाग़ बिना किसी हील हुज्जत के उन्हें पैसे दे भी रहे थे ।

आगरा से लौट कर मैं अब लोगों की इन भावनाओं का विश्लेषण करने की असफल कोशिश कर रहा हूँ । मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह सब किसी आसमानी शक्ति के प्रति हमारी मोहब्बत है अथवा उसका ख़ौफ़ । माना इस्लाम में खुदाई ख़ौफ़ का ज़िक्र है मगर हिंदुओं को क्या हुआ है , वे क्यों ईश्वर से इतना डरे हुए हैं ? उनके यहाँ तो केवल ईश्वर से प्रेम की ही बात है ? माना हज़ारों साल से हम ईश्वर को मनाने की कोशिश कर रहे हैं मगर एसा क्या है कि हम कोई चौखट छोड़ ही नहीं रहे ? जिसने जो बता दिया , वह कर दिया । जहाँ कोई इबादतगाह दिखी वहीं शीश नवा दिया । चलो यहाँ तक भी ठीक है मगर बादशाहों और उनकी बेगमों की क़ब्रों पर भी रुपए चढ़ाने की क्या तुक है ? सैंकड़ों किलोमीटर दूर पैदल चल कर माता के मंदिर में जाने की शायद कोई वजह हो सकती है मगर इस दौरान छोटे-छोटे बच्चों को भी मीलों पैदल चलवा कर कौन सी ईश्वर भक्ति हम कर रहे हैं ? ईश्वर नाराज़ हो भी गया तो इससे अधिक बुरा क्या होगा कि इतनी पूजा पाठ के बावजूद वे फटेहाल ही हैं ? ईश्वर तो शायद उनसे राज़ी दिख रहा है जो कारों में इन पैदल यात्रियों के पास से गुज़र रहे थे और ट्रेफ़िक जाम करने के कारण उन्हें हिक़ारत से देख रहे थे। एसा क्या है कि दुकानदार और मौलवी में फ़र्क़ करना भी हम भूल गए और समझ में ना आने वाली भाषा संस्कृत अथवा अरबी सुनी नहीं कि हम उसे ईश्वरीय आदेश मानने लगते हैं ? हो सकता है कि ईश्वर वाक़ई कोई डरने वाली चीज़ हो मगर डराने वाली चीज़ें हमारे आस पास कम हैं क्या ? रोज़ जो अख़बारों में जो पढ़ते हैं उससे अधिक क्या हो सकता है खुदाई ख़ौफ़ ? बंदा बंदा पूजा पाठ कर रहा है और फिर भी हमारा मुल्क नास्तिक मुल्कों से सदियों पीछे है । इससे ज़्यादा और क्या सज़ा मिल सकती है ? अजब है कि सत्ता में रहने वाली शक्तियाँ भी हमारे इस खुदाई ख़ौफ़ को और अधिक माँझती हैं । कहीं एसा तो नहीं कि इसकी मूल वजह हमारे ख़ौफ़ को ही विस्तार देना है ? ठीक ही तो है । डरा हुआ आदमी ही तो हर हालात में ख़ुद को ढाल लेता है ।

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