ख़ूनी डिबेट

रवि अरोड़ा
वैसे ही ख़ाली बैठा सोच रहा हूँ कि टीवी पर लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने जो शब्द बाण कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी पर चलाये, यही काम अगर राजीव ने किया होता और भगवान न करे उसके बाद संबित पात्रा का हार्ट फ़ेल हो जाता तब क्या होता ? क्या तब राजीव त्यागी के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 304 के तहत ग़ैरइरादतन हत्या का मुक़दमा दर्ज नहीं होता ? इस धारा के तहत तो हर वह कार्य जो सामने वाले की मृत्यु का कारण बने ग़ैर इरादतन हत्या है । राजीव त्यागी की पत्नी बता रही हैं कि लाइव डिबेट में संबित पात्रा जिस तरह से राजीव को बार बार जयचंदों-जयचंदों कह रहे थे और उनके माथे पर लगे टीके पर उन्हें धिक्कार रहे थे, उससे वे असहज महसूस कर रहे थे और उनकी तबीयत तभी से बिगड़नी शुरू हो गई थी । राजीव के आख़िरी शब्द भी यही थे कि उन्होंने मुझे मार डाला । एसे में क्या यह ग़ैर इरादतन हत्या नहीं हुई ? यह ठीक है कि संबित पात्रा सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेता हैं और उनकी पार्टी की केंद्र और राज्य दोनो जगह सरकार है अतः उनका बाल भी बाँका नहीं होगा मगर फिर भी इस मामले में कांग्रेस पार्टी को तो आगे आकर न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाना ही चाहिये । आख़िर कांग्रेस की विचारधारा का बचाव करते हुए ही तो राजीव की जान गई । अब दुख और संकट की इस वेला में राजीव त्यागी के परिवार में तो शायद ही एसा कोई है जो यह लम्बी लड़ाई लड़ सके ।
राजीव त्यागी से मेरे उस ज़माने के सम्बंध थे जब वे लोकदल में राजनीति का ककहरा सीख रहे थे । बेशक वे बेहद बहादुर व्यक्ति थे मगर मैंने उन्हें कभी अपशब्द बोलते नहीं देखा । सिखेड़ा गाँव में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सभा में उन्हें काले झंडे दिखाने पर राजीव को जब गिरफ़्तार किया गया , उस समय भी उनकी भाषा शैली बेहद शालीन थी । हालाँकि तत्कालीन एसएसपी और अन्य पुलिस अधिकारी उनसे बेहद गाली गलौज कर रहे थे मगर राजीव त्यागी ने पूरे संयम का परिचय दिया । एसी एक नहीं अनेक घटनाओं का मैं गवाह हूँ जब राजीव उत्तेजित हो सकते थे मगर वे नहीं हुए । साहिबाबाद के गाँव प्रह्लाद गढ़ी से राजीव त्यागी का गहरा नाता था और वहाँ के अनेक संस्मरण मुझे याद हैं जब उत्तेजित करने वाली परिस्थिति में भी उन्होंने आपा नहीं खोया । उनकी पत्नी स्कूल शिक्षिका हैं और बच्चों की शिक्षा भी अच्छे स्कूल-कालेजों में हुई है । कुछ मिला कर बेहद संस्कारी माहौल था राजीव त्यागी के इर्द गिर्द और यही वजह रही कि संबित पात्रा जब उन्हें बार बार जयचंदों-जयचंदों कर कर ललकार रहे थे तब भी उन्होंने एक अनुभवी, संस्कारी और शालीन प्रवक्ता की तरह केवल उँगली उठा कर जवाब देने की अनुमति भर माँगी और पात्रा को उन्ही की भाषा में अपशब्द नहीं कहे । डिबेट के घटिया स्तर, उत्तेजना के माहौल और अनर्गल आरोपों के बीच शालीनता का यही दामन थामना राजीव के हृदय पर भारी पड़ा और हृदय रोगी न होने के बावजूद उनका हृदय साथ छोड़ गया ।
वैसे राजीव त्यागी की ही यह हिम्मत ही थी कि वर्षों से टीवी की बेहद घटिया और स्तर हीन बहसों का वे सामना कर रहे थे। यक़ीनन यह डिबेट उन जैसे संस्कारी व्यक्ति के लिए नहीं थीं । राजीव त्यागी ही क्या किसी भी विचारवान, संस्कारी और शालीन व्यक्ति के लिये ये टीवी की डिबेट नहीं होतीं । पता नहीं लोग अब इन्हें देखते भी है अथवा नहीं । कम से कम मेरे जैसे लोग तो बिलकुल नहीं देखते । ड्रामेबाज़ी, फूहड़ता और घटिया स्तर की ये डिबेट होती ही दर्शक को उत्तेजित करने के लिए हैं । कल्पना कीजिये कि जिस डिबेट का काम ही दर्शक को उत्तेजित करना है तो एसे में उस व्यक्ति का क्या हाल होता होगा जिसका लाइव चीर हरण किया जा रहा हो । ठीक है ढीठ और बेशर्म की खाल तो मोटी होती है मगर शर्म वाला आदमी क्या करे ? उसे तो ये ख़ूनी डिबेट बीच में छोड़ कर उठना ही पड़ेगा वरना ये डिबेटर तैयार बैठे हैं राजीव त्यागी की उसे दुनिया से उठा देंगे ।

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