की गल है कोई नहीं

रवि अरोड़ा

ग़ालिब की शायरी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वह समझ न आये तो दोगुना मज़ा देती है । लगता है कि यही नियम अब पंजाबी गीतों पर भी लागू हो चला है । बारातों के बैंड, डीजे, विवाह स्थल पर दुल्हन के आगमन, छोटे बड़े तमाम त्योहारों और उत्सवों पर यदि पंजाबी गाना न बजे एसा अब सम्भव नहीं है । बेशक पूर्वी पंजाब के ये गाने ठेठ पंजाबियों के भी पल्ले न पड़ें मगर सामने वाले को थिरकने पर तो मजबूर कर ही देते हैं । गोवा के किसी शैक अथवा केरल के किसी होटल के लाइव कन्सर्ट में जब कोई ग़ैर पंजाबी सिंगर इन गानों को गाता है तब बेशक अर्थ का अनर्थ हो रहा हो मगर सुनने वाला फिर भी एसे झूमता है जैसे गाने के बोल उसे सब समझ आ रहे हैं । यही कारण है कि दलेर मेहंदी, मिक्का, सुखबीर, जैजीबी, गुरदास मान और हंसराज हंस जैसे गायक घर घर पहुँच गए हैं । सच कहूँ तो पंजाबी भाषी होने के नाते यह सब देख कर मैं अक्सर गौरवान्वित होता हूँ और मन ही मन मरहूम फ़िल्मी गीतकार आनंद बक्शी साहब को प्रणाम करता रहता हूँ जिनकी बदौलत आज पंजाबी ज़बान देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में सर्वाधिक पसंदीदा बन सकी ।

वैसे मुझे यह मानने में क़तई गुरेज़ नहीं है कि आनंद बक्शी कोई महान टाइप गीतकार नहीं थे । यह भी सच है कि अपने दौर के साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी, नक़्श लायलपुरी और गुलज़ार के वे पासन भी नहीं थे । बेशक उनके गीत अक्सर तुकबंदी और सिचुएशन अथवा संगीत के आधार आयें-बायें शब्द भर होते थे मगर फिर भी उनमे कुछ एसी बात थी जो उस दौर के किसी अन्य गीतकार में नहीं थी । यही वजह थी कि उन्होंने लगातार चालीस बरस तक हिंदी फ़िल्मों के गीत लिखे और छः सौ फ़िल्मों के लिए उनके चार हज़ार गाने रिकार्ड हुए । उस ज़माने में जब गीतकार कोई गाना लिखने के लिए कम से कम आठ दिन लेते थे , बक्शी साहब आठ मिनट में गीत लिख देते थे । फ़िल्म इंडस्ट्री में गानो की इस फ़ैक्ट्री यानि आनंद बक्शी ने 1958 में पहला गीत लिखा और 2002 में दुनिया से विदा होने तक लगातार वे लिखते रहे । आनंद बक्शी हालाँकि गायक बनने मुम्बई आये थे मगर उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली । संगीतकार आर डी बर्मन और सदाबहार गायक किशोर कुमार के साथ उनकी तिकड़ी ने कई फ़िल्मी सितारों की क़िस्मत बनाई । राजेश खन्ना और शशि कपूर भी इसी तिकड़ी के बल पर सुपर स्टार बन सके । पश्चिमी पंजाब के रावलपिंडी में जन्मे आनंद बक्शी को पंजाबी भाषा से इस क़दर मोहब्बत थी कि अपने गानों में वे खुलकर पंजाबी शब्दों का प्रयोग करते थे । कोई शहरी बाबू दिल लहरी बाबू , बिंदिया चमकेगी व लम्बी जुदाई जैसे सैंकड़ों हिंदी फ़िल्मों के गीत हैं जिनमे बक्शी साहब ने पंजाबी शब्द पिरो दिए । उनसे पहले कोई फ़िल्मी गीतकार एसा नहीं करता था । खाँटी के पंजाबी गीतकार साहिर , नक़्श लायलपुरी और गुलज़ार जैसे दिग्गज भी केवल उर्दू को आगे बढ़ाने में लगे रहे और पंजाबी के शब्दों का परहेज़ ही करते थे । उधर बक्शी साहब अवधी और भोजपुरी भाषी नायक अथवा नायिका के मुँह में भी पंजाबी शब्द डाल देते थे । कमाल की बात यह है कि ये गाने फिर भी ज़बर्दस्त हिट हुए और पंजाबी शब्द सुदूर राज्यों तक भी पहुँच गये। उस दौर के आप फ़िल्मी गाने सुनें और उनमे पंजाबी का कोई शब्द भी सुनाई दे तो समझ लीजिएगा कि हो न हो गाने के बोल आनंद बक्शी के ही हैं । पंजाबी को लेकर उनका मोह इससे भी समझा जा सकता है कि मोम की गुड़िया फ़िल्म में उनसे जब गाना गवाया गया तो उन्होंने बाग़ों में बहार आई..आजा मेरी रानी की जगह पंजाबी स्टाइल में आजा मेरी राणी ही गाया और गाना सुपर हिट हुआ । चरस फ़िल्म में उनके द्वारा गाए गए गीत- के आजा तेरी याद आई को सुन कर कोई भी पहचान सकता है कि गायक पक्का पंजाबी है ।

आज जब पंजाब में गली गली सिंगर पैदा हो रहे हैं । पंजाबी युवाओं में विदेश में बसने के अलावा कोई दूसरा क्रेज़ है तो वह सिंगर बनने का ही है । रोज़ नए नए एल्बम रिलीज़ हो रहे हैं । पंजाबी ओनलाइन म्यूज़िक का कारोबार विदेशों तक फैला है । हनी सिंह, अंशुमन खुराना और दलजीत दोसाँझ जैसे पंजाबी गायक हिंदी फ़िल्मों में धूम मचाए हुए हैं । अब यदि फ़िल्म में कोई प्रेम गीत बैक ग्राउंड में बजवाना हो तो बोल का पंजाबी होना आवश्यक हो गया है । यह सब देख कर जब भी इसकी तह में जाने को जी करता है तो वहाँ अपनी मातृभाषा से टूट कर मोहब्बत करने वाले आनंद बक्शी जैसे लोग ही दिखाई देते हैं जो बेशक तुकबंदी में ही कहें मगर कहते हैं- ओय की गल है कोई नहीं । तेरी आँखों से लगता है कि तू कल रात को सोई नहीं ।

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