करतारपुर से लौट कर ( भाग पांच )

रवि अरोड़ा
करतारपुर साहेब में सबसे अधिक जो बात आकर्षित करती है, वह है पाकिस्तानियों का हम भारतीयों के प्रति व्यवहार। वे लोग भारतीयों से ऐसे मिलते हैं जैसे मेले में बिछड़े दो भाई हों। शनिवार और इतवार को सैंकड़ों की तादाद में पाकिस्तानी इस गुरुद्वारे में केवल भारतीयों से मिलने की गरज से ही आते हैं। निकट का सबसे बड़ा शहर है नारोवाल और वहां के लोग सबसे अधिक यहाँ पहुंचते हैं। हालांकि लाहौर और फैसलाबाद समेत कराची जैसे बड़े शहरों के लोग भी इसी उद्देश्य से यहां आते हैं। भारतीयों के लिए कोई मिठाई लेकर आता है तो कोई घर से लजीज़ खाना बनवा कर लाता है। भारतीयों को देखते ही पाकिस्तानी अदब से दुआ सलाम जरूर करता है। हालांकि वहां के हिंदू पुरुष भी अब पठानी सलवार कुर्ता पहनते हैं और हिंदू महिलाएं भी सिर ढक कर रखती हैं मगर फिर भी हाव भाव से साफ पता चलता है कि उनमें अधिकांश मुस्लिम होते हैं। भारतीयों के साथ हाथ मिलाने और उनके साथ तस्वीर खिंचवाने का भी पाकिस्तानियों में अच्छा खासा क्रेज है।
पता नहीं मुझे क्या सनक हुई कि मैं मिलने वाले हर पाकिस्तानी से उसके शहर का नाम पूछने लगा । मुझे रावलपिंडी, लाहौर,मुल्तान, सरगोधा, गुजरात ( वहां का एक बड़ा शहर) टोबा टेक सिंह, नारोवाल, सियालकोट, कराची और कुछ अन्य शहरों के लोग मिले। इन सभी से मैंने टूटी फूटी ही सही मगर उनके जिले की बोली के अनुरूप पंजाबी में बात की। पंजाबी की इन तमाम उपबोलियों में बात करने का मुझे बचपन से ही शौक है। सराइकी भाषा भी काम चलाऊ बोल लेता हूं जो पाकिस्तान के एक बड़े भूभाग में बोली जाती है अतः स्थानीय लोगों से संवाद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं आई। भाषा का लाभ लोगों से खुल कर कुछ उगलवाने में भी काम आया । वैसे सच तो यह ही है कि स्थानीय लोग हम भारतीयों से बात करने को उत्सुक रहते हैं और मुझ जैसे बतरसी लोगों से तो आसानी से ही खुल जाते हैं। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सभी पाकिस्तानी यहां हम लोगों से मिलने ही आते हैं, धार्मिक भाव से भी बड़ी संगत यहां पहुंचती है। यह भी सच है कि ऐसे लोग जिनके पाकिस्तान में रिश्तेदार अथवा मित्र हैं और चाह कर भी उन्हें वहां जाने का वीजा नहीं मिलता वे उन्हें करतार पुर साहेब बुला लेते हैं और बिना किसी झंझट के दोनो देशों के ये लोग पूरा दिन यहां साथ बिताते हैं। अखबारों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार बंटवारे में बिछड़े आठ परिवार भी इस गुरुद्वारे की बदौलत अब तक आपस में मिल चुके हैं।
पूरा परिसर घूमने के बाद हम लोग चारदीवारी के भीतर ही बनाए गए छोटे से बाजार में पहुंचे। वहां लगभग बीस अस्थाई दुकानें हमें नजर आईं। कोई कपड़े बेच रहा था तो कोई लकड़ी का सामान। किसी दुकान पर मुल्तान का डिब्बा बंद मशहूर कराची हलवा बिक रहा था तो किसी पर महिलाओं के श्रृंगार की वस्तुएं अथवा स्मृति चिन्ह। लाहौर निवासी एक दुकानदार एहसान से मैंने जब यह कहा कि तुम्हारे पास नया क्या है, ये सब जो तुम बेच रहे हो वह तो हमें भारत में भी मिल जायेगा । इस पर उस दुकानदार ने कुछ ऐसा कहा कि मैं उसे गले लगाने से खुद को रोक नहीं पाया । लगभग तीस पैंतीस वर्षीय यह दुकानदार एहसान बोला- वीर जी यह प्यार आपको वहां नहीं मिलेगा ।
क्रमश:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

RELATED POST

मेरा जुआ गप – तेरा जुआ थू

मेरा जुआ गप - तेरा जुआ थूरवि अरोड़ापिछले हफ्ते मैं गोवा में था। होटल के निकट ही ओशन 7 नाम…

ये नाइत्तेफाकियां

ये नाइत्तेफाकियांरवि अरोड़ाहम सभी को हृदय की गहराइयों से सर्वोच्च्य न्यायालय का धन्यवाद करना चाहिए जिसने आवारा कुत्तों को लेकर…

धराली के सबक

धराली के सबकरवि अरोड़ाउत्तराखंड मेरे लिए दूसरे घर जैसा है और आए दिन मैं वहां पहुंचा रहता हूं, हालांकि मेरा…

गौशालाओं का घेवर कनेक्शन

गौशालाओं का घेवर कनेक्शनरवि अरोड़ाहरियाणा के सोनीपत में जा बसे मित्र त्रिपतजीत सिंह बावा जी मिलने आए और साथ में…