और कितने राष्ट्रीय राजमार्ग चाहिएं
और कितने राष्ट्रीय राजमार्ग चाहिएं
रवि अरोड़ा
सुबह अखबार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का बयान पढ़ा जिसमें वे दावा कर रहे हैं कि उनके पास पैसों की नहीं काम की कमी है। नरेंद्र मोदी सरकार के सबसे प्रभावी मंत्री गडकरी जब ऐसा बयान देते हैं तो यह उनके मुंह पर जँचता भी है। सरकार के वही तो इकलौते मंत्री हैं जिन्होंने ‘ डिलीवर ‘ किया है। उनके नेतृत्व में ही तो भारत इस योग्य हुआ है कि आज देश में प्रतिदिन 33.8 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग तैयार हो रहे हैं। आधुनिक तकनीक, पारदर्शिता, गुणवत्ता पर जोर और संसाधनों की उपलब्धता से साल 2014-15 में हमारे राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लंबाई जो 97,830 किलोमीटर थी, वह अब बढ़कर 1,60,155 किलोमीटर हो गई। यानी ग्यारह वर्षों में 62325 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग बढ़ गए। किसी भी विकासशील देश के लिए यह बढ़ी उपलब्धि हो सकती है मगर क्या सड़क के अतिरिक्त हमारी और कोई जरूरतें नहीं है ? क्या गडकरी के अतिरिक्त अन्य मंत्रालय के प्रभारी मंत्री भी इसी तरह असीमित बजट की बात कह सकते हैं , खासतौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मंत्रालय ? सवाल यह भी है कि अब क्या हमें आगे भी इसी गति से राजमार्गों का निर्माण जारी रखना चाहिए अथवा ठहर कर अपनी जरूरतों की समीक्षा करनी चाहिए ? विशेष तौर पर तब जब इन राजमार्गो का बोझ आम आदमी की जेब पर भी पड़ रहा हो और वह बेचारा इन सड़कों पर वाहन चलाने की कीमत सालाना 85 हजार करोड़ रुपए टोल टैक्स के रूप में चुका रहा हो। वह देश जिसकी 81 करोड़ जनता पांच किलो मुफ्त अनाज पर पल रही हो उसके लिए क्या यह रकम बहुत ज्यादा नहीं है ?
इसे गडकरी की कार्यकुशलता कहें अथवा कोई बड़ी राजनीतिक तिगड़म कि गडकरी के मंत्रालय पर प्रधानमंत्री का भी जोर नहीं चलता । गडकरी जितना बजट चाहते हैं, उतना उन्हें सरकार आंख बंद करके दे देती है। गडकरी इकलौते ऐसे मंत्री हैं जो अपनी उपलब्धियों का श्रेय मोदी जी को नहीं वरन् स्वयं को देते हैं। उनके मंत्रालय के अतिरिक्त सरकार और क्या कर रही है, इससे भी उनका कोई लेना देना नहीं होता । बड़ी से बड़ी राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय घटना पर भी वे कोई बयान नहीं देते । शायद यही वह राजनीतिक सौदे बाजी है कि जिसके बल पर मोदी के कार्यकाल में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय का बजट नाटकीय रूप से बढ़ा है। 2014-15 में यह मात्र 33,305 करोड़ रुपये था, जो 2022-23 तक 1.99 लाख करोड़ रुपये हो गया , यानी लगभग 500% की वृद्धि । 2024-25 के बजट में सड़क मंत्रालय को 2.78 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जो राष्ट्रीय राजमार्गों, भारतमाला परियोजना, और अन्य सड़क परियोजनाओं के लिए हैं। यानी आप कह सकते हैं कि मोदी सरकार में राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए बजट यूपीए के मुकाबले 5-6 गुना अधिक रहा है । इस बजट के अतिरिक्त टोल टैक्स के रूप में जनता से भी सालाना 85 हजार करोड़ रूपये वसूले जा रहे हैं। शायद यही कारण है कि गडकरी कह रहे हैं कि उनके पास पैसे की नहीं काम की कमी है।
सर्वविदित है कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और 2030 तक $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य है। ऐसे में राष्ट्रीय राजमार्ग माल ढुलाई और व्यापार के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। । बेहतर सड़कें समय और ईंधन बचाती हैं सो अलग । मगर इसके बावजूद वे सवाल गौण नहीं हो जाते जो इस अंधाधुंध निर्माण से उत्पन्न हुए हैं । बड़े पैमाने पर राजमार्गों के निर्माण से वन क्षेत्र, जैव विविधता, और प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा नुकसान हो रहा है। अकेले भारत माला परियोजना के लिए ही हजारों हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण किया गया है । सड़क निर्माण से कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ा है जो भारत के 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य के विपरीत है। यूं भी इन राजमार्गों का लाभ मुख्य रूप से औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों को ही मिलता है, जबकि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में अभी भी कनेक्टिविटी की बेहद कमी है। सरकार चाहे तो सड़कों पर जोर न देकर रेलवे और जलमार्गों में निवेश से माल ढुलाई की निर्भरता सड़कों पर से कम हो सकती है। ये वैकल्पिक मार्ग अभी तक केवल 28% माल ढुलाई ही करते हैं। 2023 में सड़क दुर्घटनाओं में 1.73 लाख मौतें हुईं, जिनमें से कई खराब सड़क डिजाइन और रखरखाव के कारण थीं । नए राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव के लिए दीर्घकालिक फंडिंग की कमी भी एक जोखिम है।
बात फिर वहीं आती है कि ये राष्ट्रीय राजमार्ग देश की जरूरतों को ध्यान में रख कर बनाए जा रहे हैं या किसी नेता के अहं की तुष्टि के लिए ? यदि ऐसा ही है तो उसका बोझ जनता पर टोल टैक्स के रूप में क्या डाला जा रहा है ? और यदि जरूरत के अनुरूप सड़कें बन रही हैं तो क्या सरकार विशेषज्ञों के साथ बैठ कर इस पर चर्चा को तैयार है कि हमें और कितने राष्ट्रीय राजमार्गों की जरूरत है ? खासतौर पर इस रौशनी में कि आज हमारे पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क तैयार हो गया है और क्षेत्रफल के हिसाब से हमने सड़कों के मामले में अमेरिका और चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। जबकि उधर, शिक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में हमारी गिनती दुनिया के पिछड़े देशों में होती है।