ओंकार सिंह का घरौंदा

रवि अरोड़ा
उनका नाम ओंकार सिंह है । मूलतः मोदी नगर के रहने वाले ओंकार सिंह पेशे से वकील हैं । उन्हें छोटे बच्चों से इतनी मोहब्बत है कि कुछ साल पहले उन्होंने लावारिस बच्चों के लिए एक आश्रम ही बना डाला । आश्रम का नाम रखा घरौंदा । आज सिंह साहब ऐसे तीन आश्रम चलाते हैं और उनके माध्यम से लगभग पचास बच्चों का लालन पालन हो रहा है । यहां शास्त्री नगर के पास वाले उनके आश्रम में 36 बच्चे हैं और खास बात यह है कि उनमें से दस दुधमुहे हैं । कोई बच्चा रेलवे स्टेशन से बरामद हुआ था तो कोई बस अड्डे से । किसी किसी को तो उसके अभिभावक कूड़े के ढेर में मरने के लिए फेंक गए । जाहिर है कि लावारिस बरामद हुए बच्चों में कन्याएं ही अधिक हैं । इन बच्चों का घर अब यह घरौंदा ही है और ओंकार सिंह उनके पापा। घरौंदा की ही एक परिचारिका लता को बच्चे मम्मी कह कर बुलाते हैं । हाल ही इस आश्रम में जाना हुआ और भारी मन से वापिस लौटा । हालांकि वहां की बातें बता कर मैं आपका भी मन भारी नहीं करना चाहता मगर लावारिस बच्चों को लेकर हमारे समाज की क्या स्थिति है, यह हमें जानना तो चाहिए ही ।

घरौंदा के पास लगभग 16 लोगों की टीम है , जो दिन रात बच्चों की देखभाल करती है । कुछ बच्चे स्कूल जाते हैं तो कुछ को वहीं घरौंदा में पढ़ाया जाता है । छोटे बच्चों के लिए विशेष तौर पर कई आया वहां बड़ी ममता से काम करती दिखीं । इन बच्चों के लालन पालन में लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं मगर सरकार इसके लिए फूटी कौड़ी भी नहीं देती । हां गाहे बगाहे जांच के नाम पर सरकारी अफसर जरूर वहां आ धमकते हैं । पता चला कि ओंकार सिंह समाज के सहयोग और अपनी जेब से सारा खर्च वहन कर रहे हैं । इस कहानी का एक दर्दनाक पहलू यह भी है कि दस साल से बड़ी बच्चियों को सरकार जबरन अन्यत्र किसी बालिका आश्रम में भिजवा देती है और ये बच्चियां एक बार फिर अपने माता पिता से बिछड़ जाती हैं । बेशक बच्चियों की सुरक्षा के मद्देनजर ही ऐसा किए जाने का दावा किया जाता है मगर नजदीक जाकर देखने से पता चलता है कि बेसहारा बच्चों को लेकर हमारा समाज ही नहीं पूरा सिस्टम ही बेहद क्रूर है ।

एक गैरसरकारी आंकड़े के अनुसार देश भर में तीन करोड़ से अधिक लावारिस बच्चे हैं । लगभग इतनी ही संख्या में निसंतान दंपत्ति हैं जो ऐसे बच्चों को गोद लेना चाहते हैं । कोविड जैसी महामारी ने जहां इन लावारिस बच्चों की संख्या में अचानक वृद्धि कर दी है तो वहीं दूसरी ओर ऐसे कामकाजी दंपत्ति की संख्या भी बढ़ी है जो पैदा करने की बजाय बच्चा गोद लेना ज्यादा उचित समझ रहे हैं । मगर हाय रे हमारी व्यवस्था ! ऐसे ऐसे कानून हैं , ऐसे ऐसे नियम हैं कि आसानी से तो कोई व्यक्ति किसी लावारिस बच्चे को गोद नहीं ले सकता । कहने को तो सारी प्रक्रिया ऑनलाइन व पारदर्शी है मगर उसमें इतनी पेचीदगियां हैं कि साल भर में चार हजार से अधिक लोग इसमें सफल ही नहीं हो पाते । उन्हें भी बच्चा गोद लेने में एक से डेड साल लग जाता है । हालांकि एक दौर में रिश्तेदारी में बच्चा गोद ले अथवा दे दिया जाता था मगर प्रॉपर्टी संबंधी विवादों से बचने को लोगबाग अब इससे बचते हैं । वैसे आपको सुनकर हैरानी होगी कि सरकार बच्चा गोद देने की कीमत वसूलती है और इच्छुक दंपत्ति को चालीस हजार रुपए का विधिवत भुगतान करना होता है । शुक्र है अदालत के एक फैसले का वरना एक साल पहले तक सरकार इस चालीस हजार रुपए पर जीएसटी भी चार्ज करती थी । लावारिस बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया को सरल करने की मांग दशकों से की जाती रही है । हाल ही में सुप्रीम कोर्ट तक भी यह मामला पहुंचा था मगर पता नहीं हमारी सरकारें इतनी निर्दयी क्यों हैं कि उसे इन करोड़ों बच्चों का रूदन सुनाई ही नहीं देता । शुक्र मनाइए कि समाज में अभी ओंकार सिंह जैसे लोग हैं जो हमारी गैरत को ललकारने को ही सही मगर घरौंदा जैसे आश्रम तो चला ही रहे हैं , वरना ..।

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