एफडीआई

रवि अरोड़ा

हालाँकि मैं व्यापारी परिवार से हूँ मगर अर्थशास्त्र में फिर भी कच्चा हूँ । आर्थिक क्षेत्र की बारीकियाँ मुझे ना पहले समझ आती थीं और ना ही अब पल्ले पड़ती हैं । अब इस एफडीआई को ही लीजिए , इसके बाबत आम हिंदुस्तानी की तरह अपनी समझ भी सिफ़र है । एफडीआई का कखग तो हम लोग अख़बारों और नेताओं के बयानों से ही समझते हैं ।

ढाई दशक पहले जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव खुली अर्थव्यवस्था की वकालत कर रहे थे , पहले पहल एफडीआई शब्द तब सुना था । इसके बाबत कोई पुख़्ता राय तब बनी जब मनमोहन सिंह सरकार फ़ॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट यानि एफडीआई लागू कर रही थी और विपक्षी भाजपाई सड़कों पर उतर कर इसका विरोध कर रहे थे । वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन दिनो गुजरात के मुख्यमंत्री थे और केंद्र द्वारा रिटेल सेक्टर में लागू 49 फ़ीसदी एफडीआई की रोज़ बखिया उधेड़ते थे । उनका दावा था कि इससे देश बर्बाद हो जाएगा तथा घरेलू उद्योगों की कमर टूट जाएगी । उनका यह भी आरोप था कि कांग्रेस देश को विदेशियों के हाथों सौंप रही है । आज के वित्त मंत्री अरुण जेटली तब राज्य सभा में भाजपा की कमान सम्भालते थे और दावा करते थे कि भाजपा आख़री साँस तक एफडीआई का विरोध करेगी । खुदरा क्षेत्र में 49 फ़ीसदी एफडीआई को लेकर तो भाजपा इतनी कुपित थी कि उसने अपने पुख़्ता वोट बैंक यानि देश भर के व्यापारियों को सरकार के ख़िलाफ़ ही खड़ा कर दिया था और तीन करोड़ की आबादी वाले इस वर्ग को अच्छी तरह समझा दिया था कि उनकी दुकानें तो अब बस बंद ही होने वाली हैं । आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठनों ने भी सरकार की नींद हराम कर दी थी । रक्षा क्षेत्र में एफडीआई के बाबत भी देश में राय बना दी गई थी कि अब राष्ट्रीय सुरक्षा ख़तरे में है । तब के एफडीआई विरोधी मोदी जी अब जब इसके लाभ गिनाते हुए रिटेल सेक्टर में सौ फ़ीसदी एफडीआई लागू कर रहे हैं तो मन अपनी नासमझियों को लेकर कोफ़्त में आ जाता है । काश हम लोग चीज़ों के प्रति अपनी स्वतंत्र और तथ्यात्मक राय बना पायें और यूँ ही नेताओं के बयानों को सत्य ना मान बैठा करें ।

पता नहीं मोदी जी तब ठीक थे या अब हैं । मुझे तो उनकी बात तब भी जमती थी और आज भी वे ठीक ही नज़र आते हैं । अब जब मोदी जी कहते हैं कि इससे देश में विदेशी निवेश का प्रवाह बढ़ेगा और रोज़गार के अवसरों में बढ़ोत्तरी होगी , तो सचमुच यक़ीन ही होने लगता है । हालाँकि जब कुछ तहक़ीक़ात करने बैठता हूँ तो फिर आशंकाएँ बलवती हो उठती हैं । जैसे सरकारी आँकड़े बताते हैं कि रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया बुरी तरह फ़्लाप हुआ है । दावों के बावजूद पिछले दो सालों में बस एक करोड़ रुपया ही विदेशी निवेश हमें मिला है । हालाँकि मोदी सरकार के कार्यकाल में तीस फ़ीसदी विदेशी निवेश बढ़ा है और पिछले साल यह साठ अरब डालर तक पहुँच गया है मगर यह भी सत्य है कि उनमे से आधे से अधिक लॉंग टर्म इन्वेस्टमेंट नहीं है और विदेशी कम्पनियाँ मुनाफ़ा कमा कर निकल लेंगी । सरकारी आँकड़े ही चुग़ली कर रहे हैं कि आधा निवेश सिंगापुर और मारिशस से आया है और माना जा रहा है कि देशी कम्पनियाँ सरकारी योजनाओं का लाभ लेने को इन दो देशों के रास्ते भारत का ही पैसा वापिस ला रही हैं । यह भी अब ज़ाहिर हो चुका है कि विदेशी कम्पनियाँ भारत से कमाया अपना धन ही विदेशी पूँजी के खाते में दर्ज करा रही हैं और इसे लेकर हम एफडीआई का भ्रम पाले हुए हैं । अनेक विदेशी कम्पनियों ने भारतीय बैंकों से ही लोन हासिल कर लिए हैं और यह रक़म भी एफडीआई के खाते में दर्ज हो रही है ।एफडीआई को मुल्क के लालायित होने के जो कारण गिनाए जाते हैं उनमे रोज़गार के अवसर और नई तकनीक और कौशल की प्राप्ति प्रमुख बताए जाते हैं । रिटेल सेक्टर से कौन सा कौशल और नई तकनीक देश को मिलेगी यह तो सरकार जाने मगर रोज़गार के मामले में तो श्रम ब्यूरो के आँकड़े कुछ और ही कहानी बता रहे हैं । उसके अनुसार एफडीआई में बढ़ोत्तरी के बावजूद पिछले दो साल में मात्र पाँच लाख नई नौकरियों का ही सृजन हुआ है । ब्यूरो के ही अनुसार 2009 के मुक़ाबले पिछले साल दस गुना कम नई नौकरियाँ पैदा हुई हैं । असमंजस में फँसा अब वह मार्ग खोज रहा हूँ जहाँ से विपक्ष के झूठ और सरकारी किलेबाज़ी के इतर कुछ ज़मीनी हक़ीक़त पता चल सके । आप भी कुछ मदद कीजिए ।

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