एजेंडे के लिए कुछ भी करेगा

रवि अरोड़ा
बीस साल पहले पिता जी को कोलोन कैंसर हो गया । आनन फ़ानन में आपरेशन कराना पड़ा । सर्जरी के बाद डाक्टर ने बताया कि अब कीमोथैरेपी भी करनी होगी । सुनकर हम लोग डर गए क्योंकि उन दिनो आदमी की कैंसर से मौत हो अथवा नहीं मगर कीमोथैरेपी से अवश्य हो जाती थी । तभी किसी ने बताया कि बनारस में कोई संस्था आयुर्वेदिक दवा देती है और उससे मरीज़ ठीक हो जाते हैं । तुरंत बनारस की दवा शुरू कर दी और क़ुदरत मेहरबान हुई और पिताजी आज तक स्वस्थ्य हैं । लगभग पंद्रह साल पहले बेटी को पीलिया हो गया । जिस चाइल्ड सपेशलिस्ट का इलाज चल रहा था वे मित्र थे । उन्होंने बड़ी बेबाक़ी से बताया कि एलोपैथी में पीलिया का समुचित इलाज नहीं है अतः किसी हकीम को दिखाओ । बेटी का इलाज संभल वाले यूनानी हकीम से कराया और वह ठीक भी हो गई । मेरे एक मित्र को कोलाईटिस की लम्बे समय से समस्या है और तमाम पेट के डाक्टरों के चक्कर काटने के बाद एक होम्योपैथिक़ डाक्टर से उन्हें आराम मिला । चेन्नई में रहने वाले के मित्र के बेटे की पेट सम्बंधी विकट समस्या का इलाज अंतत सिद्धा चिकित्सा पद्धति से हो सका । दस-बीस, सौ-दो सौ नहीं सैंकड़ों बार अनुभव हुआ कि हमारी परम्परागत चिकित्सा पद्धति बहुत कारगर है । मगर फिर भी यह सवाल कल से दिमाग़ में कौंध रहा है कि क्या इन तमाम अनुभवों के बावजूद एलोपैथी का महत्व कम हो जाता है ? क्या कोई भी परम्परागत इलाज एलोपैथी का विकल्प हो सकता है ? यदि नहीं तो भक्त लोग क्यों बाबा राम देव के बहाने आयुर्वेद बनाम एलोपैथी की बहस छेड़े हुए हैं ? एलोपैथी के बिना क्या एक दिन भी वो काट सकते हैं ?
एक मित्र बताते हैं कि उन दिनो जब डिलीवरी के समय माँओं की अक्सर मृत्यु हो जाती थी तब अर्थी उठने से पहले जो लड़के के पिता की चप्पल पर पैर रख दे नई दुल्हन के लिए उसके द्वारा प्रस्तावित रिश्ते को प्राथमिकता दी जाती थी । याद कीजिये वह दौर जब विधुर होने पर भी लड़के का कुँआरी कन्या से विवाह हो जाता था और विधवा होने पर लड़की को तमाम उम्र बेबसी में काटनी पड़ती थी । आयुर्वेद के हिमायतियों से कम से कम यह तो पूछा ही जाना चाहिये कि यह इलाज पद्धति तो उस दौर में भी थी फिर क्यों डिलीवरी के समय एक लाख में से बारह सौ माएँ मर जाती थीं ? क्या वजह है कि अब यह आँकड़ा केवल 167 पर सिमट गया है ? आज़ादी के समय जन्म लेने के छः महीने के भीतर हर पाँचवा बच्चा मर जाता था और क्यों अब यह आँकड़ा एक हज़ार में केवल 38 रह गया है ? हमारे पुरानी परम्परागत इलाज के तरीक़े इतने ही कारगर थे तो क्यों आज़ादी के समय भारतीयों की औसत उम्र मात्र 45 साल थी और कैसे अब यह 69 साल हो गई है ? गाँवों में इलाज तो अधिकांशत हकीम और वैद्य ही करते हैं फिर वहाँ क्यों शहरों के मुक़ाबले लोगबाग़ चार साल कम जीते हैं ? जब एलोपैथी नहीं थी और जड़ी बूटियों से ही इलाज होता था तब क्यों मलेरिया, हैज़ा , टीबी , चेचक व प्लेग से लोग धड़ाधड़ मरते थे और अब कैसे चुटकियों में इलाज हो जाता है ? एलोपैथी के बिना क्या यह सम्भव था ? बेशक बहुत से डाक्टर लुटेरे हैं । अनेक अस्पताल नोट छापने की मशीनें हैं और दवा कम्पनियों का जाल दुनियाभर में फैला है मगर इसमें दोष किसका है , व्यवस्था का या एलोपैथी का ?
पूरी राम कथा के पीछे मेरे कहने का अर्थ यही है कि बेशक अनेक मामलों में परम्परागत इलाज मुफ़ीद साबित होता है मगर एलोपैथी फिर भी एलोपैथी है । इंसान और इंसानियत के विकास में विज्ञान के बाद चिकित्सा की इस पद्धति का ही दूसरा बड़ा योगदान है । यूँ भी यह पद्धति श्रुतियों के आधार पर नहीं वरन पैथोलोजिकल परिणामों के दम पर काम करती है । मैं भली भाँति जानता हूँ कि आयुर्वेद बनाम एलोपैथी की बहस करने वाले केवल दिखावे को एसा कर रहे हैं । उनके बच्चे अंग्रेज़ी डाक्टरों के यहाँ ही जन्मे हैं । शुगर , ब्लड प्रेशर , हार्ट, अर्थराइटिस और थाईराइड की तकलीफ़ में भी वे अंग्रेज़ी इलाज ही कराते हैं । दरअसल आयुर्वेद उनके लिए कोई चिकित्सा पद्धति नहीं वरन राजनीतिक एजेंडा भर है । वह एजेंडा जो इतिहास के काल्पनिक काल खंडों में दुनिया को ले जाना चाहता है । पुरातनपंथियों की यह पूरी जमात एसे मौक़ों की ही तलाश में रहती है । इसबार रामदेव की दवा के बहाने इन्हें फिर अपना एजेंडा याद आ गया । अब एजेंडे के लिये तो भक्त कुछ भी करेगा ।

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