एक राजा वो भी थे

रवि अरोड़ा
यह दिसम्बर 1990 की बात है । देश के आठवें प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार कुछ दिन पहले ही गिरी थी । गेम चेंजर बनने की चाह में वी पी सिंह ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने की घोषणा कर ख़ुद अपने ही पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली थी । उनकी इस घोषणा से देश भर में भूचाल आ गया था और अगड़ी जातियों के युवाओं ने आत्मदाह शुरू कर दिया था । कुल 62 छात्र जल कर मरे और दो सौ से अधिक घायल हो गये । देश भर में हुए उग्र छात्र आंदोलन से वीपी सिंह घबरा गये थे और उन्होंने ख़ुद को अपने घर में ही एक तरह से क़ैद कर लिया था । मामला जब थोड़ा बहुत ठंडा पड़ा तब जाकर ही उन्होंने लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया । इसी बीच मोदी नगर के तत्कालीन विधायक व जनता दल के नेता सुखबीर सिंह गहलौत और पार्टी के तत्कालीन ज़िला अध्यक्ष पृथ्वी सिंह मेरे समेत ग़ाज़ियाबाद के कुछ पत्रकारों को उनसे मिलवाने दिल्ली उनके आवास पर ले गए । उन दिनो मैं जन समावेश नाम का अख़बार निकालता था । गहलौत साहब अब इस दुनिया में नहीं हैं और पृथ्वी सिंह अब भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं । वीपी सिंह से हम लोगों की बातचीत लगभग एक घंटा चली और मुझे यह याद करते हुए ख़ुशी हो रही है कि पूरी बातचीत मेरे एक दो सवालों के इर्द गिर्द ही रही । आज अचानक वीपी सिंह की बात क्यों यह जानने के लिए आपको पूरे वाक़ये को जानना होगा ।
मेरा पहला सवाल हम लोगों को चाय-पानी पिला रहे एक दस बारह साल के बच्चे को लेकर था कि पूर्व प्रधानमंत्री के घर पर बाल श्रमिक कैसे काम कर रहा है ? इस पर वीपी सिंह का आत्मविश्वास ज़रा विचलित हुआ । अगला सवाल यह था कि ये जो साठ से अधिक छात्र जल कर मरे हैं , क्या आपके सपने में आते हैं ? मेरे इस इकलौते सवाल पर वीपी सिंह लगभग आधा घंटा बोले । उन्होंने कहा कि जिस दिन पहले छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह का प्रयास किया मैं बुरी तरह घबरा गया । रात भर सोया नहीं और कमरे में चक्कर ही काटता रहा । अगले दिन से जब देश भर से छात्रों के जलने के समाचार मिलने लगे तो मैं जैसे धराशाही ही हो गया । देश भर से मुझे गालियों भरी चिट्ठियाँ रोज़ आने लगीं और इन चिट्ठियों की गिनती हज़ारों में होती थी । मेरे घर वाले भी मुझसे कहने लगे कि क्या आप सचमुच इतने बुरे हैं । पूरी बातचीत के दौरान मैंने ग़ौर किया कि सर्द मौसम के बावजूद उनकी हथेलियों पर पसीना आ रहा था और बार बार वे एक सफ़ेद रुमाल से कभी बायें हाथ की हथेली का पसीना पौंछते तो कभी दायें हाथ की । साफ़ झलक रहा था कि वे बुरी तरह आत्मग्लानि में डूबे हुए हैं और उनका आत्मविश्वास बुरी तरह हिला हुआ है । चूँकि वीपी सिंह कवि भी थे अतः मैंने पूछा कि क्या यह मौतें भी आपको कुछ लिखने को उकसाती हैं ? हालाँकि इस सवाल के जवाब में उन्होंने अपनी सफ़ाई दी और देश की जातिगत और आर्थिक विषमताओं पर हमें राजनीतिक सा भाषण पिलाया ।
अब बात उस विषय पर कि आप वीपी सिंह की चर्चा क्यों ? दरअसल लॉकडाउन के दौरान तीन मई तक के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 338 ग़ैर कोरोना मौतें देश भर में हुई हैं । आज पाँच जून तक यह आँकड़ा यक़ीनन पाँच सौ को पार कर गया होगा । सरकार की मूर्खता के चलते ये लोग सड़कों और रेल की पटरियों पर मरे मगर क्या कहीं किसी छोटे-बड़े नेता के चेहरे पर ग़म की शिकन आपको दिखाई देती है ? क्या अजब इत्तफ़ाक़ है कि वीपी सिंह भी मोदी जी की तरह ख़ुद को फ़क़ीर कहते थे । हालाँकि वीपी सिंह राज परिवार से थे और इतिहास राजा-महाराजाओं को क्रूर कहता है । यूँ भी वे मजबूत हृदय वाली ठाकुर बिरादरी से थे । मगर वे केवल बासठ मौतों से इतनी आत्मग्लानि में डूब गये कि उनका स्वास्थ्य तबाह हो गया और शांतिपरक़ मृत्यु भी उन्हें नसीब नहीं हुई । उधर हमारे मोदी जी तो ख़ुद को पिछड़ी जाति का और ग़रीब बताते हैं , वे किस बात पर टीवी पर अकड़ कर चलते दिखते हैं ? श्रीमान मोदी जी यूँ तो अब वह दौर ही नहीं रहा कि कोई आप जैसे आदमी से सवाल कर सके मगर साहब वक़्त का क्या भरोसा अब नहीं तो बाद में कभी , कोई न कोई आपसे पूछेगा ज़रूर कि कीड़े मक़ौड़े की तरह मरे लोग क्या आपके भी सपने में आते हैं ?

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