एक दौर था

एक दौर था जब बनारस के लिए कहा जाता था-रांड साँड़ सीढ़ी और सन्यासी , इनसे जो बचे उसे लगे काशी । वेश्याव्रती तो अब काशी में नहीं होती । कई कई दिन तक लगातार लड़ने वाले साँड़ भी काशी में कम हुए हैं । घाट की सीढ़ियाँ बेशक अभी भी फिसलनी हैं और धूर्त सन्यासी अब भी लोगों को ठगते हैं मगर समय का पहिया तेज़ी से बदल चुका है । अब बनारस मोदी जी का है और मोदी जी हैं बनारसी बाबू । तो क्या इतने भर से काम चल जाएगा ? क्या कुछ और करने की क़तई ज़रूरत नहीं है ?

अरसे बाद बनारस जाना हुआ । इत्तफ़ाक़ से उसी दिन यानी बारह दिसम्बर को बनारस पहुँचा जिस दिन मोदी जी जापानी प्रधानमंत्री को लेकर वहाँ गंगा आरती के लिए गए थे । उम्मीद थी की मोदी जी की मोजूदगी और वहीं से सांसद होने के नाते इस शहर के प्रति उनके झुकाव का फ़ायदा बनारस को मिला होगा मगर शहर के हालात देख कर निराशा ही हुई । जगह जगह ग़ंदगी के ढेर पहले की तरह ही दिखाई दिए । हर बार की तरह गंगा इस बार भी मैली मिली । सवाल उठना लाज़मी है कि क्या मोदी जी को यहाँ से संसद भेजने का कोई फ़ायदा स्थानीय लोगों को नहीं मिला ? क्या प्रधानमंत्री की मोजूदगी से भी किसी शहर का भला नहीं हो सकता ? जवाब की तलाश में मुझे आप लोगों का सहयोग भी अपेक्षित है । हालाँकि यहाँ यह भी साफ़ कर दूँ कि काशी के लोग अभी नाउम्मीद नहीं हुए हैं और उन्हें लगता है कि मोदी जी ज़रूर कुछ करेंगे ।अपने बनारसी ठगों के लिए अरसे तक कुख्यात रहे काशी को विश्वास है कि उसे कोई ठग नहीं सकता । चाहे वह कोई भी हो । ईश्वर करे कि मोदी जी उन्हें निराश ना करें ।

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